Saturday , August 1 2026 3:54 PM
Home / Business & Tech / ‘कॉर्पोरेट जॉब शायद ही 9 से 5 की होती है’, 21 साल की नौकरी छोड़ करने लगे यह काम, अब पीट रहे लाखों

‘कॉर्पोरेट जॉब शायद ही 9 से 5 की होती है’, 21 साल की नौकरी छोड़ करने लगे यह काम, अब पीट रहे लाखों


राजस्थान के उदयपुर में महेंद्र पंवार ने मिसाल कायम की है। अपनी जमी-जमाई कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर उन्‍होंने खेती को अपनी कमाई का जरिया बनाया है। वह ‘मेवाड़ एक्जॉटिक फ्रूट फार्म’ के संस्थापक हैं। 21 साल के शानदार कॉर्पोरेट करियर को अलविदा कहने के बाद उन्‍होंने खेती करने का फैसला किया। अपनी बंजर पुश्तैनी जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की ऑर्गेनिक खेती शुरू कर वह आज लाखों की कमाई कर रहे हैं। आइए, यहां महेंद्र पंवार की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।
महेंद्र पंवार के पिता भारतीय सेना में डॉक्टर थे। उनका शुरुआती जीवन पिता के साथ देश भर में घूमते बीता। उन्होंने मैनेजमेंट (MBA) और होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद महेंद्र ने सॉफ्टवेयर, एजुकेशन और हॉस्पिटैलिटी जैसे सेक्टरों में लगभग 21 साल तक नौकरी की।
कॉर्पोरेट नौकरियां शायद ही कभी 9 से 5 की होती हैं। वे अक्सर चौबीसों घंटे आपके समय की डिमांड करती हैं। मेरे पास अपने परिवार के लिए बहुत कम समय था। महेंद्र पंवार
2016 में कॉर्पोरेट जगत को कहा अलविदा – लेकिन, भागदौड़ भरी जिंदगी और कॉर्पोरेट वर्कलोड के कारण वह अपने परिवार को समय नहीं दे पा रहे थे। एक बेहतर ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ और खुद का कुछ बड़ा शुरू करने की चाहत में उन्होंने साल 2016 में कॉर्पोरेट जगत छोड़ दिया। इसके बाद अपनी पुश्तैनी जमीन की ओर रुख किया।
स्‍टार्टअपपीडिया के साथ बातचीत में महेंद्र ने कहा था, ‘कॉर्पोरेट नौकरियां शायद ही कभी 9 से 5 की होती हैं। वे अक्सर चौबीसों घंटे आपके समय की डिमांड करती हैं। मेरे पास अपने परिवार के लिए बहुत कम समय था। इतने सालों तक दूसरों के लिए काम करने के बाद मुझे लगा कि अब अपना खुद का कुछ बनाने का समय आ गया है।’
विदेश में सीखे खेती के गुर – महेंद्र के पास खेती का कोई पुराना अनुभव नहीं था। उन्‍होंने इंटरनेट पर रिसर्च करने के साथ सीधे उन देशों का रुख किया जहां पहले से एक्‍जॉटिक फलों की मजबूती खेती होती थी। साल 2016 में उन्होंने वियतनाम जाकर वहां के खेतों में मजदूरों के साथ खुद काम किया।
इसके पीछे मंशा यह थी कि खेती की बारीकियों और सालभर उत्पादन लेने की तकनीकों को व्यावहारिक रूप से सीखा जा सके। इसके बाद उन्होंने फिलीपींस का दौरा कर ड्रैगन फ्रूट के वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनाने की समझ विकसित की और भारत लौट आए।
उदयपुर के पास उनकी 1.5 एकड़ पुश्तैनी जमीन का लगभग 80% हिस्सा पथरीला और असमतल था। इसे खेती योग्य बनाने में ही उन्हें काफी मशक्‍कत करनी पड़ी।
देसी जुगाड़ से की लागत में कटौती – ड्रैगन फ्रूट एक कैक्टस प्रजाति का पौधा है। इसे सहारे की जरूरत होती है। इसके लिए महेंद्र ने 7-फीट के आरसीसी सीमेंट पोल लगाए। खर्च कम करने के लिए उन्होंने एक देसी जुगाड़ लगाया। महंगे सीमेंट रिंग्स (लगभग 350 रुपये प्रति पीस) की जगह उन्होंने महज 10-10 रुपये में मोटरसाइकिल के पुराने टायरों का इस्तेमाल कर अपनी शुरुआती लागत को काफी कम कर दिया।
महेंद्र ने अपने फार्म पर सफेद पल्प वाली आम वैरायटी के बजाय ‘मोरोक्कन रेड’ वैरायटी के ड्रैगन फ्रूट को चुना। यह बहुत मीठा होता है। राजस्थान की भीषण गर्मी को भी आसानी से बर्दाश्त कर लेता है। अब उनका यह छोटा सा फार्म हर सीजन में औसतन 8 से 9 टन पूरी तरह ऑर्गेनिक ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन कर रहा है।
इंस्‍टाग्राम और व्‍हाट्सएप से मार्केटिंग – फसल बेचने के लिए महेंद्र किसी मंडी या बिचौलिए पर निर्भर नहीं हैं। वह अपनी वेबसाइट, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के जरिए सीधे देश के करीब 850 परिवारों को ड्रैगन फ्रूट बेचते हैं। इससे उनकी सालाना करीब 15 लाख रुपये की कमाई होती है।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने फार्म को ‘एग्रो-टूरिज्म’ हब में बदल दिया है। यहां 4-5 कमरों का विलेज स्टे बनाया गया है। देश-विदेश से वॉलंटियर्स और पर्यटक आकर यहां प्रामाणिक राजस्थानी ग्रामीण जीवन का आनंद लेते हैं।