
देश की अर्थव्यवस्था के लिए फ्रीबीज अब बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। भयावह नतीजे दिखने के बाद भी इसके चक्र से निकलना मुश्किल होता जा रहा है। राजनैतिक और वित्तीय हलकों में इसकी चर्चा छुपकर हो रही है, लेकिन नेता सार्वजनिक तौर पर स्टैंड लेने से बच रहे हैं। विधानसभा चुनावों में भी इसके असर नजर आने लगे हैं।
जरूरी खर्च के लिए भी पैसे नहीं – असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव से पहले 37,000 करोड़ रुपये कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किए गए। इनमें 20,000 करोड़ सिर्फ कैश ट्रांसफर थे। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर फ्रीबीज का सिलसिला जारी रहा तो सालाना एक लाख करोड़ रुपये का खर्च होगा।
पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले 38,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बाद सरकार के पास जरूरी खर्चों के लिए पैसे ही नहीं बचे। नतीजतन, बिजली दरें बढ़ीं, बुनियादी ढांचा से जुड़े कामकाज ठप पड़ गए। राज्य के सामने वित्तीय संकट से निपटने के लिए शराबबंदी हटाने का विकल्प भी विचाराधीन है। हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने में परेशानी होने लगी है। मध्य प्रदेश लगातार कर्ज ले रहा है। लगभग हर राज्य की वित्तीय हालत खराब हो रही है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट में भी इस पर चिंता जताई गई है।
राज्यों में होड़ – कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रीबीज पर बहस शुरू करने की कोशिश की, लेकिन BJP शासित राज्य और केंद्र की योजनाओं के कारण यह गंभीर स्तर तक नहीं पहुंच सकी। पिछले दो-तीन बरसों में देश में मुफ्त कल्याणकारी योजनाएं तेजी से बढ़ी हैं। 2025-26 के बजट के अनुसार, केवल महिलाओं वाली DBT स्कीमों पर राज्यों का खर्च 1,68,040 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इससे वित्त वर्ष 2026 में राजस्व खर्च 7-9% बढ़ सकता है। बढ़ा हुआ राजस्व खर्च विकास कार्यों पर असर डालता है। सड़क, पुल, बांध जैसे इन्फ्रा प्रॉजेक्ट पर यही पैसा लगाया जा सकता था। ऐसा नहीं होने पर रोजगार सृजन प्रभावित होता है। स्कूल-कॉलेज और कौशल विकास में सुस्ती से भविष्य में तरक्की धीमी हो सकती है। माना जा रहा है कि अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भी ऐसी योजनाएं लागू की जा सकती हैं।
अर्थव्यवस्था हो रही सुस्त – केंद्र सरकार भी ऐसी योजनाओं के दबाव में आएगी। अगले दो वर्षों केंद्र के सामने आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। पीएम मोदी के तीसरे टर्म के दूसरे साल में ईरान युद्ध का बड़ा आर्थिक असर दिख सकता है। अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी तो राहत पैकेज की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए पैसा चाहिए। साथ ही, अगले साल की शुरुआत में आठवें वेतन आयोग के तहत नया वेतनमान लागू करना होगा, जिससे राज्यों को भी वेतन बढ़ाना पड़ेगा। यह वर्ग बड़ा वोटर भी है। सीमित खजाने और सिकुड़ते संसाधनों के बीच मुफ्त योजनाओं और विकास कार्यों का संतुलन बनाए रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आर्थिक दबाव, महंगाई और चुनावी योजनाओं का समन्वय अब कठिन होता दिख रहा है।
Home / Uncategorized / फ्रीबीज की राजनीति से बढ़ा आर्थिक संकट, चुनावी सौगातों से इकॉनमी का होगा बुरा हाल
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