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अमेरिका ने ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ से ‘इंडो’ हटाया, मोदी-ट्रंप मुलाकात से पहले नया ड्रामा, QUAD से बाहर निकले भारत?


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने से पहले डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ से ‘इंडो’ शब्द हटा दिया है। इसका एक बहुत ही गहरा भू-राजनीतिक मतलब है। अमेरिका के युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने मई 2026 के शांग्री-ला डायलॉग में जो भाषण दिया था उसने अमेरिका की नई विदेश और रक्षा नीति का आधार तय कर दिया था। उसी दौरान उन्होंने ‘इंडो’ शब्द से परहेज करना शुरू कर दिया था। अमेरिका के ओबामा प्रशासन से लेकर ट्रंप के पहले प्रशासन के दौरान और फिर बाइडेन प्रशासन के समय ‘इंडो-पैसिफिक’ का खूब इस्तेमाल किया गया था लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ये शब्द पीछे छूट गया है।
सबसे खास बात ये है कि अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान वाले गठबंधन ‘QUAD’ का आधार ही ‘इंडो-पैसिफिक’ को मिलाकर है। ऐसे में ‘इंडो’ शब्द को हटा देने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत को क्वाड से बाहर निकल आना चाहिए। ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ से ‘इंडो’ शब्द हटाने का बहुत साफ मतलब ये निकलता है कि अमेरिका अब बहुपक्षीय आदर्शवाद या पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को एक धागे में पिरोने की कोशिशों के बजाय सिर्फ अपने मुख्य प्रशांत महासागरीय हितों और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करेगा। अमेरिका को अब चीन को काउंटर करने के लिए भारत की जरूरत नहीं है और शायद ये G-2 की सोच को ही आगे बढ़ाता है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में ही बदला गया था नाम – 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में ही अमेरिकी सैन्य कमान का नाम U.S. Pacific Command (USPACOM) से U.S. Indo-Pacific Command (INDOPACOM) किया गया था। उस समय तत्कालीन रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने कहा था कि यह भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका और हिंद महासागर-प्रशांत महासागर की जुड़ी हुई सुरक्षा वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए किया गया है।
लेकिन अब पेंटागन ने इसे फिर से Pacific Command (USPACOM) नाम देने की घोषणा की है और कहा है कि यह ‘लीगेसी’ और ‘ऐतिहासिक रूट’ को बहाल करने के लिए किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि कमान का क्षेत्र, मिशन और जिम्मेदारियां नहीं बदल रही हैं।
क्या भारत को QUAD से निकल जाना चाहिए? – दिप्रिंट में लिखते हुए भारत के सीनियर जर्नलिस्ट और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट आर. जगन्नाथन ने लिखा है कि ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका से ज्यादा मनमानी करने वाला कोई दूसरा देश नहीं है। उस पर कोई भी वैश्विक कानून या नियम लागू नहीं होते लेकिन वह जो कानून और नियम बाकी दुनिया पर थोपना चाहता है वे सभी पर लागू होते हैं। सिवाय तब जब दूसरी पार्टी के पास ‘ना’ कहने की ताकत हो। अभी सिर्फ चीन और रूस के पास ही यह क्षमता दिखती है। भारत का पहला मकसद अपनी राष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक ताकत के दम पर ऐसी संप्रभुता हासिल करना होना चाहिए।’
उन्होंने तर्क दिया है कि भारतीय नाविकों की हत्या करने के बाद अमेरिका ने अफसोस तक जाहिर नहीं किया जो बताता है कि उसके लिए भारत का महत्व क्या है? इसीलिए भारत को तत्काल अमेरिका से अपनी निर्भरता कम करनी शुरू कर देनी चाहिए। निर्भरता की वजह से ही भारत ने पिछले एक साल में डोनाल्ड ट्रंप से लेकर कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लटनिक, पीटर नवारो और अब रुबियो तक की बेतुकी बातों को चुपचाप सहा है। उन्होंने तर्क दिया है कि हमें बिजनेस और जियोपॉलिटिकल स्तर पर बड़े पैमाने पर संतुलन बनाने की जरूरत है। हालांकि अमेरिका के साथ बहस करने या रिश्ते खराब करने की कोई जरूरत नहीं है लेकिन पर्दे के पीछे यही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
‘इंडो’ शब्द हटाने के पीछे भारत के लिए बड़ा संदेश – ऊपरी तौर पर देखें तो सिर्फ नाम बदला गया है लेकिन वो नाम ठीक तब बदला गया है जब आज फ्रांस की राजधानी पेरिस में मोदी और ट्रंप की मुलाकात होनी है। ये रणनीतिक संकेत और संदेश दोनों है। पिछले साल फरवरी में मोदी से मिलने से पहले ट्रंप ने ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ का ट्वीट किया था और बाद में भारत पर 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया था। इसीलिए ‘इंडो’ शब्द हटाने का साफ साफ मतलब है कि अमेरिका भारत को संदेश दे रहा है कि वो अगर साथ नहीं भी है तो फर्क नहीं पड़ता। ट्रंप संदेश दे रहे हैं कि अमेरिका को भारत की जरूरत नहीं है।
इसके अलावा शायद ट्रंप प्रशासन ये संकेत देना चाह रहा है कि अमेरिका का मुख्य सैन्य फोकस पश्चिमी प्रशांत यानि ताइवान, जापान, फिलीपींस और चीन से जुड़ी प्रत्यक्ष चुनौतियां हैं। यानि भारत महत्वपूर्ण हो सकता है लेकिन रणनीतिक केन्द्र में नहीं है। ये सबसे अहम संदेश है। यानि अमेरिका भारत को महत्वपूर्ण साझेदार मानता है लेकिन पूरी एशिया रणनीति को भारत-केंद्रित पहचान नहीं देगा।