
भोजशाला पर फैसला क्या आया …इसे जानने से पहले इसके इतिहास के बारे में जानना जरुरी है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला एक ऐतिहासिक और धार्मिक परिसर है, जिसे लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के राजा भोज से माना जाता है, जिन्होंने 11वीं सदी में धार को शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बनाया था।
विवाद की पृष्ठभूमि – हिंदुओं और हिंदुओं से जुड़े संगठनों का दावा रहा है कि यहां मां सरस्वती की पूजा होती थी और यह संस्कृत अध्ययन का प्रमुख स्थान था। लेकिन मुस्लिम समुदाय इसे नहीं मानता। इस विवाद में मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा था। भोजशाला के बारे में मुस्लिम शासकों के काल में मुस्लिमों के जरिए इसमें तोड़ फोड़ और इसके मूल स्वरुप के साथ बदलाव की भी बातें सामने आती हैं।
हाईकोर्ट का फैसला – इसी मसले पर विवाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में बरसों से चल रहा था। इंदौर बेंच ने ASI से परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने को कहा था। ASI के सर्वे के बाद…जो तथ्य अदालत के सामने रखे गए …उससे मुस्लिम पक्ष का दावा कमजोर पड़ गया और आखिर कार शुक्रवार को मध्यप्रदेश की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में भोजशाला को देवी वाग्देवी का मंदिर माना और मुस्लिम पक्ष के दावे को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट के फैसले की खास बातें – यह मामला सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व, संवैधानिक अधिकार और धार्मिक पहचान से जुड़ा बड़ा कानूनी विवाद बन चुका है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इंदौर बेंच के इससे जुड़े फैसले की 10 बातें जो अहम हैं, और जो देश में चल रहे .. ऐसे ही अन्य विवादों के हल का रास्ता खोल सकती हैं..उन्हें जानना जरूरी है….
राजा भोज से जुड़ा इतिहास – इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का निर्माण परमार वंश के राजा भोज के समय हुआ था। हिंदू पक्ष दावा करता है कि यहां देवी वाग्देवी की पूजा होती थी।
ASI द्वारा संरक्षित स्मारक – भोजशाला के पूरे परिसर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक का दर्जा मिला है। सांप्रदायिक सद्भाव के नजरिए से इसलिए यहां पूजा और नमाज को लेकर प्रशासनिक नियम भी लागू किए गए।
2003 में बना था पूजा-नमाज का फॉर्मूला – भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 2003 में व्यवस्था बनाई थी कि मंगलवार को हिंदू पूजा करेंगे और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करेगा।
कैसे शुरु हुआ विवाद – ब्रिटिश काल और आजादी के बाद भी इस परिसर को लेकर समय-समय पर विवाद होता रहा। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि परिसर मूल रूप से मंदिर है और वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए। इसके बाद मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने ASI सर्वे का आदेश दिया था – मार्च 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने का आदेश दिया था ताकि ऐतिहासिक और धार्मिक दावों की जांच हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर रोक नहीं लगाई – मुस्लिम पक्ष ने सर्वे के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने सर्वे पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
वैज्ञानिक तकनीकों से हुआ सर्वे – ASI ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR), फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और अन्य आधुनिक तकनीकों की मदद से सर्वे किया।
सर्वे में मिले कई धार्मिक अवशेष – रिपोर्ट्स के मुताबिक सर्वे के दौरान मंदिर वास्तुकला से जुड़े कई अवशेष और मूर्तियां मिलने का दावा किया गया।
हाईकोर्ट ने भोजशाला को मंदिर माना – इंदौर बेंच ने अपने फैसले में कहा कि भोजशाला देवी वाग्देवी का मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र है। अदालत ने ASI के 2003 वाले आदेश को भी निरस्त कर दिया।
केंद्र सरकार और ASI को निर्देश – कोर्ट ने परिसर के प्रबंधन और प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार और ASI को आगे की कार्रवाई करने को कहा है। इस बात की भी
चर्चा है कि कोर्ट ने न सिर्फ इसे हिंदू मंदिर माना, बल्कि कोर्ट ने लंदन से वाग्देवी की मूर्ति वापस लाने पर भी टिप्पणी की।
मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकता है – हालांकि हाइकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को अलग मस्जिद के लिए जमीन देने का विकल्प खुला रखा है। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि मुस्लिम पक्ष इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है। ऐसे में अंतिम फैसला अभी बाकी माना जा सकता है।
आगे की राह – भोजशाला विवाद अब सिर्फ एक धार्मिक स्थल का मामला नहीं रह गया है। यह केस इतिहास, पुरातत्व, धार्मिक अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था के बीच संतुलन का बड़ा उदाहरण बन गया है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इस विवाद की दिशा तय कर सकती है। यदि सुप्रीम कोर्ट.. हाईकोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखता है …तो आने वाले समय में देश में चल रहे कई मंदिर-मस्जिद विवादों को सुलझाने की चाभी मिल सकती है।
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