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‘चीन की घटती आबादी भारत के लिए खतरा’, क्यों ताइवान नहीं अरुणाचल हो सकता है ड्रैगन का पहला निशाना?


पिछले कई दशकों से अमेरिका समेत पश्चिमी देश और जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स चीन की लगातार मजबूत होती ताकत और उसकी आबादी को दुनिया की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा मानते आ रहे थे। लेकिन वाशिंगटन स्थित ‘मिडिल ईस्ट फोरम’ के नीति विश्लेषण निदेशक माइकल रुबिन का मानना है कि चीन की घटती आबादी दरअसल एक बड़ा खतरा है। खासकर भारत के लिए। उन्होंने संडे गार्जियन में लिखे एक लेख में आशंका जताते हुए तर्क दिए हैं कि घटती आबादी से परेशान चीन पहले ताइवान नहीं बल्कि अरुणाचल को निशाना बना सकता है।
दरअसल संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNPF) के आंकड़ों के मुताबिक 2023 में भारत की आबादी चीन से आगे निकल चुकी है। अनुमान है कि वर्ष 2100 तक जहां भारत की आबादी 1.5 अरब से ज्यादा होगी वहीं चीन की आबादी सिमटकर महज 633 मिलियन यानि करीब 63.3 करोड़ के आसपास रह जाएगी। यानि वर्तमान आबादी से 55% कम जनसंख्या हो जाएगी।
इतिहास की चेतावनी- जब-जब आबादी घटी तो युद्ध बढ़ा – रूस का उदाहरण- 1990 के दशक की शुरुआत में रूसकी आबादी लगभग 14.8 करोड़ के शिखर पर थी लेकिन उसके बाद के दो दशकों में इसमें काफी गिरावट आई। इसके मुख्य कारण कम जन्म दर, पुरुषों की उच्च मृत्यु दर और लोगों का देश छोड़कर जाना थे। आज रूस की आबादी आज 14.3 करोड़ है।
रूस ने साल 2008 में जब जॉर्जिया पर हमला किया था और 2014 में जब उसने यूक्रेन पर हमला कर क्रीमिया पर कब्जा किया तो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कई बार जनसांख्यिकी बदलाव (डेमोग्राफी) को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया।
ईरान का संकट- ईरानकी कुल आबादी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का हिस्सा 1986 में 18% था जो एक दशक बाद गिरकर 10% रह गया। 2013 में तत्कालीन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने कहा ‘बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी न होना एक बीमारी है।’ 2020 में खामेनेई के सहयोगी होज्जतोलइस्लाम हुसैन मिर्जाई ने कहा कि एक बड़ी आपदा को टालने के लिए ईरान के पास सिर्फ 5 साल का समय है।
उन्होंने संसद में कहा ‘अगर यह सुनहरा समय हाथ से निकल गया तो हम निश्चित रूप से एक संकट का सामना करेंगे।’ बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार की कोशिशें नाकाम रहीं। इसके बजाय खामेनेई ने इस्लामिक गणराज्य को संघर्ष की ओर धकेल दिया।
चीन ने क्रूरता के साथ लागू की थी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ – चीन ने 1980 से 2016 तक ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’को सख्ती से लागू किया जिसकी वजह से आज वहां युवाओं की भारी कमी और बुजुर्गों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो चुकी है। चीन ने ‘एक बच्चा पैदा करने की नीति’ की वजह से लाखों परिवार पूरी तरह से खत्म हो गये। उनका अस्तित्व ही मिट गया। अब चीन तेजी से बच्चा पैदा करने के दर को बढ़ाना चाहता है लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है।
चीनी कम्युनिस्ट अधिकारियों ने अपनी वन-चाइल्ड पॉलिसी को लागू करने में बहुत क्रूरता दिखाई। उन्होंने महिलाओं की जबरन नसबंदी कराई और कुछ मामलों में तो पैदा हुए अतिरिक्त बच्चों को मार भी डाला। बेटे की चाहत रखने की सांस्कृतिक सोच ने जनसांख्यिकीय प्रभावों को और गंभीर बना दिया क्योंकि बहुत से चीनी लोगों ने बेटा पाने के लिए कन्या भ्रूण हत्या या बच्चियों की हत्या करना शुरू कर दिया। कुछ पीढ़ी बाद इसका नतीजा यह हुआ कि बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की संख्या और भी कम हो गई।
शी जिनपिंग का ध्यान भटकाने का दांव, ताइवान या भारत? – माइकल रुबिन ने तर्क दिया है कि जब किसी देश की आबादी घटती है तो उसकी अर्थव्यवस्था भी सुस्त पड़ने लगती है। चीन में घटती कार्यबल और मंदी के कारण सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है। ऐसे में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अपनी सत्ता बचाने और राष्ट्रवाद को भड़काने के लिए एक बाहरी ‘डाइवर्टिंग वॉर’ यानि ध्यान भटकाने वाला युद्ध की तलाश कर सकती है। जैसा वो बार बार अरुणाचल प्रदेश को लेकर बयान देती रहती है।
अमेरिकी रणनीतिकार अक्सर मानते हैं कि चीन का पहला निशाना ताइवान होगा। लेकिन ताइवान पर हमला करना बीजिंग के लिए बेहद जोखिम भरा है। ताइवान पर हमले की स्थिति में अमेरिका की नौसेना और वायुसेना सीधे मैदान में उतर सकती है। हालांकि ताइवान का भू-भाग बेहद दुर्गम है जिससे उस पर कब्जे की राह आसान नहीं है।
ताइवान नहीं भारत पर मंडराता असली खतरा – बीजिंग के रणनीतिकार यह हिसाब लगा सकते हैं कि ताइवान के मुकाबले भारत के खिलाफ सीमा पर आक्रामकता दिखाना उनके लिए कम जोखिम भरा होगा। माइकल रुबिन ने लिखा है चीन को लगता है कि- अमेरिका की चुप्पी- अमेरिका ‘रियलपॉलिटिक’ का हवाला देकर तटस्थ रह सकता है जैसा कि 1962 में हेनरी किसिंजर के दौर में देखा गया था।
रणनीतिक स्थान- अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख (अक्साई चिन) और भारत का रणनीतिक ‘चिकन नेक’ यानि सिलीगुड़ी कॉरिडोर चीन के लिए आसान निशाना बन सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय नियम- चीन को भरोसा है कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करने वाला देश होने के नाते तुरंत किसी कठोर परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा।
क्या भारत तैयार है? – भारत के पूर्व सैन्य अधिकारी जेएस सोढ़ी ने बार बार कहा है कि चीन 2030 के बाद भारत पर हमला कर सकता है और भारत को अपनी सैन्य तैयारियां करने के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है। उन्होंने कहा है कि भारत को युद्धस्तर पर अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए और जिन क्षेत्रों में कमजोरी है उसे वक्त रहते सही करना चाहिए।
माइकल रुबिन का कहना है कि फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध से ठीक पहले तक बड़े-बड़े राजनयिक मानते थे कि रूस हमला नहीं करेगा। लेकिन तानाशाही शासन जब अपने अस्तित्व के संकट से जूझते हैं तो वे कोई भी दुस्साहस कर सकते हैं।
माइकल रुबिन के अनुसार, यदि चीन अपनी जनसांख्यिकी और आर्थिक मंदी से ध्यान भटकाने का रास्ता चुनता है, तो भारत को अपनी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर सबसे बुरी स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।