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बिल्डिंग ढहने से लेकर आग लगने तक, 5 साल में 33 हजार लोगों की मौत; NCRB के डेटा से बड़ा खुलासा


देश के शहरी बुनियादी ढांचे और नागरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच देश भर में इमारत गिरने, आग लगने और गड्ढों या मैनहोल में गिरने की घटनाओं में लगभग 33 हजार लोगों की मौत हुई। इनमें से ज्यादातर मौतें शहरी इलाकों में हुईं, जो सिविक गवर्नेंस और सुरक्षा नियमों को लागू करने में गंभीर कमियों की ओर इशारा करती हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्टों पर आधारित आंकड़ों के मुताबिक, हर साल हजारों लोगों की जान ऐसे हादसों में जाती है, जिन्हें बेहतर निगरानी, नियमित रखरखाव और सुरक्षा नियमों के प्रभावी पालन से काफी हद तक रोका जा सकता था।
असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा होने की आशंका – हालांकि, 33 हजार का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। नगर निगम की सीमा के भीतर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं, जिनमें कई मामलों में खराब सड़कें और गड्ढे भी भी शामिल हैं, इनमें कोई अलग से डेटा उपलब्ध नहीं है। इसी तरह दूषित पानी के कारण होने वाली मौतों का भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में वास्तविक संख्या काफी अधिक हो सकती है।
टूटती इमारतें, आग और खुले मैनहोल बने खतरा – विशेषज्ञों का कहना है कि खराब रखरखाव, असुरक्षित इमारतें, खुले या क्षतिग्रस्त मैनहोल और सुरक्षा मानकों की अनदेखी जैसी समस्याएं केवल दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि शहरी प्रशासन की जवाबदेही से सीधे जुड़ी हैं।
‘हर स्तर पर तय हो जवाबदेही’ – दिल्ली की हालिया घटनाओं ने लोगों का ध्यान खींचा है, लेकिन गुड़गांव और दिल्ली के कुछ हिस्सों में जलभराव और कचरे के ढेर जमा होने की घटनाएं साफ तौर पर दिखाती हैं कि नगर निगम का कामकाज कितना खराब हो गया है। शहरी विकास विभाग के पूर्व सचिव एम. रामचंद्रन ने कहा, ‘हर कॉरपोरेटर या पार्षद, नगर निगम अधिकारी और मेयर को अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।’
डिरेगुलेशन और ईज ऑफ कंस्ट्रक्शन पर संतुलन जरूरी – इस सेक्टर में काम कर चुके एक्सपर्ट्स और पूर्व अधिकारियों ने भी इस बात पर जोर दिया कि कंस्ट्रक्शन को आसान बनाने और डीरेगुलेशन (नियमों में ढील) के लिए सरकार की कोशिशों में संतुलन होना चाहिए। एक एक्सपर्ट ने कहा, ‘आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए डीरेगुलेशन और ऐसे डीरेगुलेशन जिससे नागरिक व्यवस्था बिगड़ जाए, इन दोनों के बीच बहुत बारीक फर्क है, और सब कुछ डीरेगुलेट करने की जल्दबाजी में यह फर्क नजरअंदाज़ हो गया है।
उन्होंने कहा, अधिकारी यह फर्क नहीं समझ पा रहे हैं और डीरेगुलेशन के नाम पर रोजमर्रा के काम भी नहीं कर रहे हैं। इसका एक अहम बुरा असर ‘डी-स्किलिंग’ (कौशल का नुकसान) के तौर पर सामने आया है, क्योंकि अब वे फैसले लेने और काम करने में सक्षम नहीं रहे हैं।’