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आपस में बात करेंगे इंसान और जानवर, AI की बदौलत 2030 तक सच हो सकती है वर्षों पुरानी कोशिश, लेकिन इसके खतरे भी


इंसानों में पिछले कई सालों से दूसरे जीवों या जानवरों से बातचीत करने की इच्छा रही है। लंबे समय तक उनकी भाषा को ठीक से ना समझ पाने के बाद, वे ज्यादातर तोते और दूसरे पक्षियों को अपनी भाषा सिखाकर ही काम चला रहे थे, लेकिन अब इंसान जानवरों से बात करने में सक्षम हो पाएंगे। यह एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से हो पाएगा। AI बहुत तेजी से दुनिया को बदल रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2030 तक इंसान AI की मदद से जानवरों के साथ-साथ पक्षी की बातों को समझ पाएंगे। इसके लिए दो तकनीक एआई और छोटे रिकॉर्डिंग टैग्स एक साथ मिलकर काम करेंगे, जिन्हें बायोलॉर्गस कहेंगे, लेकिन यह एक बड़ खतरा भी हो सकता है।
खतरा हो सकता जानवरों से बात करना – यह सुनने में काफी दिलचस्प लग सकता है, लेकिन इसके कुछ परेशान करने वाले नतीजे भी हो सकते हैं। उस समय के बारे में सोचें, जब इंसानों की भीड़ पक्षियों के झुंड से बातचीत करने की कोशिश करने लगे। या शिकारी शिकार के लिए AI का इस्तेमाल करके नए तरह के जाल बिछाने लगें। यह सोचने में तो साइंस फिक्शन जैसा लगता है, लेकिन रिसर्चर का मानना है कि AI इसे हकीकत के करीब ला सकता है।
वर्षों पहले भी हो चुकी है ये कोशिश – ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, जानवरों से बातचीत करने की कोशिश करना कोई नई और पहली बार नहीं है। इससे पहले भी काफी कुछ हो चुका है। असल में, इंसान हजारों वर्षों से ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं। रिसर्चर को 12,000 साल पुरानी हड्डियों से बनी बांसुरियां मिली हैं, जिनका इस्तेमाल शायद बाजों से बात करने के लिए किया जाता था। दशकों बाद, जानवरों की मनोवैज्ञानिक आइरीन पेपरबर्ग ने एलेक्स नाम के अफ्रीकी ग्रे तोते पर 30 साल तक स्टडी की है, जिसकी 2007 में मौत हो गई। यहां तक कि लोकप्रिय मानवविज्ञानी जेन गुडाल ने भी दावा किया था कि वह समझ सकती थीं कि चिंपैंजी क्या कह रहे हैं।
AI और बायोलॉगर्स एक साथ मिलकर करेंगे काम – अब स्थिति पहलवे से काफी अलग है। क्योंकि नई-नई टेक्नोलॉजी मार्केट में आ गई हैं। दो टेक्नोलॉजी AI और बायोलॉगर्स को एक साथ लाया गया है। बता दें कि बायोलॉगर्स बहुत छोटे इलेक्ट्रॉनिक टैग्स होते हैं, जिन्हें वैज्ञानिक अलग-अलग प्रजातियों पर उनकी आवाजें रिकॉर्ड करने के लिए लगाते हैं, चाहे वह व्हेल का गाना हो या भेड़िये का हुआं-हुआं करना। रिसर्च करने वालों का अब मानना ​​है कि अगर AI को इन रिकॉर्डिंग्स का काफी बड़ा डेटासेट दिया जाए, तो वह ऐसे पैटर्न पहचानना शुरू कर सकता है, जिन्हें इंसान सदियों से नहीं देख पाए हैं और शायद जानवरों की बात का मतलब समझने में भी मदद कर सकता है।
2030 तक मिल जाएगा समाधान – इस क्षेत्र के सबसे बड़े दानदाताओं में से एक, प्राइवेट इक्विटी अरबपति जेरेमी कॉलर को समय-सीमा को लेकर पूरा भरोसा है। उनका मानना ​​है कि AI इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है कि हम 2030 तक इसका समाधान ढूंढ लेंगे। जैसा कि उन्होंने जून में एक स्पीच में कहा था। इस लक्ष्य को पाने की कोशिश कर रहे ज्यादा रिसर्चर की सोच एक जैसी है। उनका मानना ​​है कि अगर लोग सच में यह समझ सकें कि जानवर क्या सोचते और महसूस करते हैं, तो वे जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज करने, औद्योगिक खेती का सपोर्ट करने या प्राकृतिक आवासों के विनाश की अनदेखी करने की संभावना कम रखेंगे।
जानवरों के लिए नुकसान – लेकिन यहां एक बड़ी समस्या है। हम इंसानों की पुरानी आदत रही है कि जिस भी जानवर के बारे में हमने जानकारी हासिल की या पढ़ाई की, बाद में उसी के खिलाफ हमने अपने हथियारों और औजारों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बता दें कि बीसवीं सदी में व्हेल का शिकार करने वाले लोग सोनार का इस्तेमाल करके व्हेल को डराकर सतह पर लाते थे और फिर उन्हें मार देते थे।
आज शिकारी पक्षियों की आवाज की नकल करते हैं लेकिन अब वे स्पीकर पर रिकॉर्डिंग चलाकर पक्षियों को सीधे जाल में फंसाते हैं। यहां तक कि AI ट्रांसलेशन की इस नई लहर पर काम करने वाले रिसर्चर भी मानते हैं कि खतरा असली है। उनका कहना है कि कौवों के कम्युनिकेशन पर उनके अपने काम का शिकारी गलत इस्तेमाल करके उसे एक आसान, लेकिन खतरनाक मैसेज में बदल सकते हैं।
इसलिए, भले ही किसी कौवे या व्हेल से बातचीत करने का विचार साइंस-फिक्शन जैसा लगे, लेकिन रिपोर्ट एक बात साफ करती है। जानवरों को समझना शायद आसान काम हो। लेकिन जिम्मेदारी के साथ ऐसा करना असली चुनौती हो सकती है।