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तेल की तपिश से बढ़ेगी महंगाई! सरकार और विपक्ष आमने-सामने, जनहित की इस जंग में किसके हाथ लगेगी बाजी


ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच कच्चे तेल, LNG और LPG की कीमतों में भारी उछाल से भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे हुए हैं। सरकार का कहना है कि जनता पर बोझ कम रखने के लिए एक्साइज ड्यूटी घटाई गई, जबकि विपक्ष आरोप लगा रहा है कि चुनाव तक कीमतें रोकी गईं।
अखिलेश प्रताप सिंह: ईरान और अमेरिका की लड़ाई क्या भारत ने शुरू कराई? जंग से कच्चा तेल उछल गया। दुनियाभर के मुकाबले अपने यहां तो पेट्रोल-डीजल के दाम कम ही बढ़े हैं। पब्लिक पर बोझ न बढ़े, इसलिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर राजस्व छोड़ दिया है, जो पूरे साल में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। यह मुश्किल वक्त है, सबको समझना चाहिए। कमोबेश यही बातें सरकारी अधिकारियों से लेकर BJP नेताओं तक, सभी कह रहे हैं। लेकिन, विपक्ष के पास अपने तर्क हैं।
28 फरवरी को युद्ध शुरू होने से पहले जो कच्चा तेल 60-70 डॉलर प्रति बैरल था, वह 50% उछल चुका है। सरकारी कंपनियों के लिए विदेशी कच्चे तेल का औसत खरीद मूल्य फरवरी में करीब 69 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 117.09 डॉलर प्रति बैरल हो गया। अप्रैल में 114.48 डॉलर/बैरल रहने के बाद मई में अब तक इसका औसत 107.84 डॉलर/बैरल पर है। LNG की अंतरराष्ट्रीय कीमत 50% से ज्यादा उछली है और LPG का भाव दोगुने से ज्यादा हो चुका है।
कैसे होंगे काम – सरकारी तेल कंपनियों ने 15 मई के बाद 4 बार में पेट्रोल-डीजल के दाम कुल 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए हैं। दाम न बढ़ाने से सरकारी कंपनियों को रोजाना 1000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था और अब भी लगभग 600 करोड़ रुपये रोज का नुकसान है। सरकार कह रही है कि हालात ऐसे ही रहे तो 3 महीने में ही सरकारी तेल कंपनियों का सालभर का मुनाफा खत्म हो जाएगा। ये अपने लाभ का एक हिस्सा सरकार को देती हैं, जिससे वह कई काम करती है। लाभ का कुछ हिस्सा तेल-गैस कुओं की खोज और उत्पादन से लेकर पेट्रोल-डीजल व दूसरी चीजें बनाने की क्षमता बढ़ाने में निवेश किया जाता है। मुनाफा ही नहीं रहेगा, तो यह सब कैसे होगा?