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इसे कहते हैं रियल वॉरियर! एम्बुलेंस से एग्जाम हॉल तक, कैसे एक टीनेजर ने कैंसर से लड़ाई लड़ी और बोर्ड एग्जाम दिए


अंजुला जायसवाल, नई दिल्ली: एक साल पहले जिंदगी में सब कुछ अस्पताल के गलियारों और एम्बुलेंस की चमकती लाइटों जैसा धुंधला सा लग रहा था। अंकिता (बदला हुआ नाम) को याद है कि वह एक स्ट्रेचर पर लेटी थी, हाथों में किताबें नहीं, बल्कि ड्रिप लगी थी। जब एक एम्बुलेंस उसे 12वीं क्लास के प्रैक्टिकल एग्जाम के लिए ले जा रही थी। अंकिता बताती हैं कि जहां उसके क्लासमेट्स को नंबरों की चिंता थी, वहीं वह अपनी जान बचने के बारे में सोच रही थी।
एक बुखार से शुरू हुआ कैंसर का संघर्ष – उसकी मुश्किलों की शुरुआत 2024 की शुरुआत में एक ऐसे बुखार से हुई जो ठीक ही नहीं हो रहा था। पैथोलॉजिकल टेस्ट में कुछ खास पता नहीं चला और उसने खुद को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि यह कुछ भी गंभीर नहीं है। अचानक उसकी हालत तेजा से बिगड़ने लगी और आस-पास के अस्पतालों के डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसके बचने की उम्मीद सिर्फ 1% है। उसने अस्पताल में लगभग एक महीना बिताया, जिसमें ICU में बिताए लंबे दिन भी शामिल थे। उसकी जिंदगी सिर्फ सुइयों और दवाइयों तक सिमट कर रह गई थी कि आगे क्या होगा। अगस्त 2024 तक अपोलो अस्पताल उसका दूसरा घर बन चुका था।
स्टेरॉयड और मल्टी-ड्रग कीमोथेरेपी से जूझना और एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया से जंग – पीडियाट्रिक हीमेटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमिता महाजन की देखरेख में अंकिता को ‘एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया’ (एक तरह का ब्लड कैंसर) का पता चला था, जिसे स्टेरॉयड और मल्टी-ड्रग कीमोथेरेपी दी जाने लगी। इस इलाज का उसके शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ा। एक समय तो ऐसा भी आया जब कुछ दिक्कतों की वजह से अंकिता के पैरों में बहुत ज्यादा कमजोरी आ गई और उसका अपने ब्लैडर पर से कंट्रोल भी खत्म हो गया।
पिता को पहले गंवा चुकी थी, मां भी साथ छोड़ गई और आर्थिक तंगी – डॉक्टरों ने उसके इलाज के तरीके में बदलाव किया और उसमें न्यूरोलॉजिकल देखभाल और फिजियोथेरेपी को भी शामिल किया, जिससे उसे धीरे-धीरे अपनी ताकत वापस पाने में मदद मिली। अस्पताल के बाहर जिंदगी से उसे कोई खास सहारा नहीं मिला। पिछले साल ही उसकी मां गुजर गई थीं और उसके पिता बचपन से ही उसके साथ नहीं थे। मौसी के साथ रहने वाली अंकिता को पैसों की तंगी का भी सामना करना पड़ रहा था।
कई दिन तो ऐसे भी गुजरे जब मैं टेस्ट करवाने के लिए एक लैब से दूसरी लैब तक अकेले ही जाती थी। एक तरफ अपना इलाज करवा रही थी तो दूसरी तरफ अपनी जिंदगी की जिम्मेदारियां भी निभा रही थी।
64% से पास हुई तो फूट-फूटकर रोई – इन सब मुश्किलों के बावजूद उसने अपनी पढ़ाई से नाता नहीं तोड़ा। जब 2025 में 12वीं क्लास के बोर्ड एग्जाम नजदीक आए तो यह पक्का नहीं था कि अंकिता एग्जाम दे भी पाएगी या नहीं। लेकिन उसने हार मानने से साफ इनकार कर दिया। उसने अपने प्रैक्टिकल एग्जाम कीमोथेरेपी के अलग-अलग साइकल्स के बीच में दिए; अस्पताल से एग्जाम सेंटर तक का हर सफर उसने एम्बुलेंस में तय किया, जिसमें एक डॉक्टर और एक नर्स हर पल उसके साथ रहते थे। वह अपना पेपर खत्म करती और सीधे वापस अपने अस्पताल के बिस्तर पर लौट आती थी। बाद में जब उसे कुछ समय के लिए ठीक होने का मौका मिला तो उसने अपने थ्योरी एग्जाम घर से ही दिए। जब नतीजे घोषित हुए (उसे 64% नंबर मिले) तो वह रो पड़ी।
एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया एक गंभीर बीमारी है, लेकिन समय पर इलाज मिलने पर नतीजे अच्छे हो सकते हैं। सबसे खास बात अंकिता का पक्का इरादा था। अब एक साल बाद अंकिता की हालत स्थिर है और वह मेंटेनेंस थेरेपी पर है; वह हर महीने एक बार इंजेक्शन लगवाने और अपनी सेहत की जांच करवाने के लिए अस्पताल जाती है। डॉ. अमिता महाजन
अब BCA में कराया दाखिला, जिंदगी सुधर रही है – वह कहती है- हो सकता है यह सुनने में ज्यादा न लगे, लेकिन मेरे लिए इसका मतलब सब कुछ था। इस बीच उसने अपनी जिंदगी को फिर से संवारना शुरू कर दिया है; उसने BCA कोर्स में दाखिला ले लिया है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।