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कब्ज से सिरदर्द, पेट फूलना, मुंह से दुर्गंध की समस्या, 5 योगासन से Chronic Constipation से राहत पाएं


पुरानी कब्ज यानी क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन पाचन संबंधी सबसे आम समस्याओं में से एक है, फिर भी ज्यादातर लोग इस पर ध्यान नहीं देते। जो लोग हफ्तों या महीनों से कब्ज से परेशान रहते हैं, उन्हें पेट फूलना, मुंह से दुर्गंध आना, सिरदर्द, ऊर्जा की कमी और त्वचा पर दाने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।
क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन से राहत पाने के लिए खानपान और दिनचर्या में बदलाव के साथ ही कुछ योगासन फायदेमंद हैं। अगर आप भी कब्ज से परेशान रहते हैं तो इस लेख की जानकारी आपके काम जरूर आएगी।
क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन की वजहें – कब्ज का आमतौर पर कोई एक कारण नहीं होता। लाइफस्टाइल से जुड़ी गलत आदतों और कुछ हेल्थ प्रॉब्लम्स के कारण धीरे-धीरे कब्ज की समस्या बढ़ती है।
फाइबर की कमी- भोजन में फाइबर की कमी, पानी कम पीना और प्रोसेस्ड फूड की लत कब्ज के प्रमुख कारण हैं। जो लोग पर्याप्त फल, सब्जियां और साबुत अनाज नहीं खाते उन्हें कब्ज की समस्या होने की संभावना ज्यादा रहती है।
पानी कम पीना- पर्याप्त पानी न पीना भी एक प्रमुख कारण है। अगर शरीर हाइड्रेटेड नहीं तो मल सख्त और निकलने में मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा फिजिकल एक्टिविटी की कमी पाचन सहित सभी चीजों को धीमा कर देती है।
चिंता और तनाव- आंत और मस्तिष्क लगातार संवाद करते रहते हैं इसलिए चिंता और तनाव भी आंत के कार्य से गहराई से जुड़े हुए हैं।
रोग और आदतें- शौच जाने की इच्छा को अनदेखा करना, अनियमित नींद, थायरॉइड की समस्या और कुछ दवाएं समय के साथ कब्ज की समस्या को बढ़ा सकते हैं।
लंबे समय तक कब्ज रहने पर क्या होता है ? – ज्यादातर लोग सोचते हैं कि कब्ज सिर्फ असहज होती है, गंभीर नहीं। यह पूरी तरह सच नहीं है। जब मल लंबे समय तक आंत में रहता है, तो विषाक्त पदार्थ रक्त में फिर से अवशोषित होने लगते हैं। इससे लगातार पेट फूलना, मुंह से दुर्गंध आना, सिरदर्द, ऊर्जा की कमी और त्वचा पर दाने हो सकते हैं। समय के साथ मल त्याग के दौरान लगातार जोर लगाने से मलाशय पर दबाव पड़ता है, जिससे पाइल्स और फिशर जैसी दर्दनाक स्थितियां हो सकती हैं।
पाचन क्रिया को बेहतर बनाने वाले 5 योगासन – कब्ज की समस्या से राहत पाने के लिए योग एक बेहतरीन उपाय है। क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन से बचने के लिए ये 5 योगासन किए जा सकते हैं-
पवनमुक्तासन – पीठ के बल लेटें और एक-एक करके घुटनों को छाती तक लाएं। दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर घुटनों को पेट पर मजबूती से दबाएं। सांस छोड़ते हुए सिर और कंधों को जमीन से ऊपर उठाएं और ठुड्डी को घुटने से स्पर्श करने की कोशिश करें। 10-20 सेकंड तक इसी मुद्रा में सामान्य रूप से सांस लेते रहें। अब सांस अंदर लेते हुए सिर और पैर को वापस जमीन पर सीधा कर लें। यह आसन फंसी हुई गैस को निकालने और पाचन क्रिया को बेहतर बनाने का सबसे आसान तरीका है।
अर्ध मत्स्येंद्रासन – यह बैठकर किया जाने वाला आसन पाचन अंगों को गीले कपड़े की तरह निचोड़ता है, जिससे आंतों में रक्त संचार बेहतर होता है और मल त्याग में सहायता मिलती है।
पैरों को सामने की ओर सीधा फैलाकर दंडासन में बैठ जाएं। रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी होनी चाहिए। दाहिने पैर को घुटने से मोड़ें और दाहिने पैर की एड़ी को बाएं कूल्हे के पास जमीन पर टिकाएं। अब बाएं पैर को उठाएं और दाहिने घुटने के ऊपर से लाते हुए दाहिने पैर के बाहर जमीन पर सपाट रखें। बायां घुटना ऊपर की तरफ रहेगा।
दाहिने हाथ को बाएं घुटने के ऊपर से ले जाते हुए बाएं पैर के पंजे या टखने को पकड़ें। बाएं हाथ को पीठ के पीछे जमीन पर सीधा रखें। अब पेट, कंधों और गर्दन को बाईं ओर मोड़ें। बाएं कंधे के ऊपर से पीछे की ओर देखने का प्रयास करें। सामान्य रूप से सांस लेते हुए इस मुद्रा में लगभग 20 से 30 सेकंड तक रुकें। धीरे-धीरे सांस छोड़ते सामान्य स्थिति में आ जाएं। दूसरी तरफ भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
मलासन – पैरों के बीच कुछ इंच का अंतर रखकर सीधे खड़े हो जाएं। फिर घुटनों को मोड़ें और उकड़ू (स्क्वाट) मुद्रा में नीचे बैठ जाएं। एड़ियां जमीन पर सपाट होनी चाहिए। अब दोनों घुटनों को थोड़ा बाहर की तरफ फैलाएं। धड़ को थोड़ा आगे की ओर झुकाएं और दोनों हाथों की हथेलियों को छाती के पास लाकर ‘नमस्ते’ की मुद्रा में जोड़ लें।
दोनों कोहनियों को जांघों के भीतरी हिस्से पर टिकाएं और हल्के से बाहर की ओर दबाव डालें, जिससे कूल्हे और जांघें खुलें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें, छाती को बाहर निकालें और कंधों को रिलैक्स रखें। स्क्वाट मुद्रा वास्तव में मल त्याग के लिए सबसे प्राकृतिक और प्रभावी मुद्रा है। मलासन का नियमित अभ्यास श्रोणि तल को शिथिल करता है और आंतों को गति प्रदान करता है।
बालासन – बालासन में व्यक्ति शिशु के समान विश्राम मुद्रा में होता है। इसके लिए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाते हुए शरीर को आगे की तरफ मोड़ें। माथे और दोनों हथेलियों से जमीन को छुएं। यह सौम्य विश्राम मुद्रा पेट को धीरे से दबाती है और तंत्रिका तंत्र को शांत करती है। तनाव कब्ज का एक प्रमुख कारण है इसलिए बाल मुद्रा आंतरिक रूप से इसके मूल कारण को दूर करने में मदद करती है।
सुप्त मत्स्येंद्रासन – पीठ के बल सीधे लेट जाएं। पैरों को सीधा रखें और हाथों को शरीर के बगल में फैला लें। दाहिने पैर को घुटने से मोड़ें और छाती के पास लाएं। फिर दाहिने घुटने को शरीर के आर-पार बाईं ओर जमीन पर ले जाएं। इस दौरान बायां पैर बिल्कुल सीधा रहना चाहिए। दाहिने हाथ को कंधे की सीध में सीधा फैलाएं। गर्दन व चेहरे को दाईं ओर घुमाएं।
इस मुद्रा में 5 से 10 गहरी सांसें लें और रीढ़ में खिंचाव महसूस करें। फिर इसी प्रक्रिया को बाएं पैर को मोड़कर और दाईं ओर घुमाकर दोहराएं। यह आसन आंतों को आराम देता है और मल को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को आसान बनाने में सहायता करता है।
लाइफ स्टाइल में बदलाव करें – योग से आपको काफी फायदा होगा, लेकिन सही आदतों के साथ योग करने से ज्यादा लाभ मिलेगा। सुबह उठते ही सबसे पहले एक गिलास गुनगुना पानी पिएं। इससे पाचन क्रिया सक्रिय होती है और आंतों को काम करने का संकेत देती है।
रात को गुनगुने पानी या दूध में एक चम्मच घी मिलाकर पीना एक पुराना आयुर्वेदिक नुस्खा है, जो रात भर में धीरे-धीरे असर दिखाता है।
भोजन में साबुत अनाज जैसे जई और बाजरा, पत्तेदार सब्जियां, दालें, अलसी और मौसमी फल जैसे पपीता, अमरूद और नाशपाती से भरपूर फाइबर शामिल करें।
मैदा, दूध, तले हुए खाद्य पदार्थ और चीनी का सेवन कम करें। ये पाचन को धीमा करते हैं।
कभी भी खाना न छोड़ें या अनियमित समय पर न खाएं, नियमित दिनचर्या पाचन प्रक्रिया को दुरुस्त रखती है।
हर दिन कम से कम 20 से 30 मिनट पैदल चलें, पर्याप्त नींद लें और शौचालय जाने की प्राकृतिक इच्छा को कभी भी नजरअंदाज न करें। ये छोटे-छोटे बदलाव आपकी आंतों की कार्यप्रणाली को सुधारेंगे, जिससे कब्ज की समस्या दूर हो जाएगी।