
विजय गोखले: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला, जिसके बाद डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के ब्लॉकेड की बात कही है। इन सबके बीच पूरे युद्ध के दौरान चीन की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं। चीन पश्चिम एशिया के संघर्ष से इसलिए दूर नहीं रहा क्योंकि वह कमजोर है। वह इस तरह के मामलों में अक्सर सारे पहलुओं का विश्लेषण करने के बाद कोई राय बनाता है। ईरान युद्ध में भी उसने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या की निंदा की, मगर खुलकर हस्तक्षेप नहीं किया। इसे कुछ लोग चीन की कमजोरी मान रहे हैं, लेकिन यह सच नहीं है।
छोटे देश कम नहीं – चीन इससे खुश है कि फिलहाल अमेरिका अकेला पड़ गया है। ईरान युद्ध में इजरायल को छोड़कर दूसरे सहयोगी देशों ने दूरी बनाए रखी। वहीं चीन को इस जंग से कई सबक मिले हैं। 1991 के गल्फ वॉर के बाद चीन ने अपनी सेना को आधुनिक बनाया है। लेकिन ईरान जैसे संघर्ष दिखाते हैं कि तकनीक के दम पर कोई जंग जल्दी नहीं जीती जा सकती।
चतुर रणनीति से छोटा देश भी बड़ी ताकतों को परेशान कर सकता है। फिर किसी भी क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए सेना जमीन पर उतारनी पड़ती है। यह चीन के लिए सबक है, जिसने 1979 के बाद से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा है। उसने 2049 से पहले ताइवान को अपने में मिलाने की घोषणा की है। लेकिन हालिया युद्ध बताते हैं कि यह आसान नहीं होगा। ताइवान भले छोटा देश हो लेकिन सही रणनीति से वह चीन को चुनौती दे सकता है।
अमेरिका पर नजर – ताइवान स्ट्रेट के रास्ते दुनिया का 20% समुद्री व्यापार होता है। चीन इस जलमार्ग को बाधित तो कर सकता है, लेकिन ऐसा करने पर उसे अमेरिका के विरोध का सामना करना पड़ेगा। ईरान आज होर्मुज स्ट्रेट में अपनी ताकत आजमा रहा है।
ताइवान स्ट्रेट को लेकर इससे मिले सबक चीन के काम आएंगे। चीन की सेना अमेरिकी रणनीति, उसके हथियारों और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल पर करीबी नजर रख रही है, ताकि आने वाले समय के लिए अपनी तैयारी बेहतर कर सके।
विचारधारा पर जोर – चीन को ईरान युद्ध से यह सबक मिला है कि जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जा सकता है। अपने बुनियादी ढांचों को भी अमेरिकी हमलों से बचाने के लिए और मजबूत बनाया जा सकता है।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भी सप्लाई चेन मजबूत करने पर जोर है, ताकि संकट के समय इकॉनमी पर आंच न आए। ईरान से चीन को यह भी सीख मिली है कि मजबूत विचारधारा और एकजुट संगठन मुश्किल हालात में भी टिके रहते हैं। इसलिए, चीन कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एकता बढ़ाने और बाहरी विचारों से सतर्क रहने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
पर्दे के पीछे – चीन ईरान युद्ध के दौरान खुलकर सामने नहीं आया, पर उसने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया ताकि उसके हित सुरक्षित रहें। उसने ईरान से तेल और व्यापारिक लेनदेन जारी रखा। ग्रे शिपिंग व बैंकिंग चैनल जैसे अलग-अलग तरीकों से उसकी मदद करता रहा।
कुछ खबरों के मुताबिक, चीन ने कुछ दोहरे उपयोग वाली (सिविलयन और मिलिटरी) चीजें ईरान को दी हैं और BeiDou सिस्टम (अमेरिकी GPS का विकल्प) जैसी तकनीकी मदद भी की।
बढ़ेगा प्रभाव – ईरान युद्ध में आगे जो भी हो, इससे चीन को फायदा मिलेगा। अव्वल तो चीन पर ईरान पहले की तुलना में कहीं ज्यादा निर्भर होगा, खासकर तेल और बुनियादी ढांचों के पुनर्निर्माण में। दोनों देश और करीब आ सकते हैं।
होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे जलमार्गों पर उसकी पकड़ और कस सकती है। ईरान और रूस जैसे देशों के करीब आने से चीन को यूरेशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलेगी और यहां पश्चिमी देशों का प्रभाव कम हो सकता है।
टूटता वर्चस्व – इस युद्ध से चीन को पता चल गया कि अमेरिका की ताकत अब पहले जैसी नहीं रही। चीन अब दुनिया को वैकल्पिक प्रौद्योगिकी, उन्नत हथियार, सैटेलाइट आधारित नेविगेशन, AI प्लैटफॉर्म और नए व्यापार चैनल भी दे सकता है। हालांकि असल सवाल है कि चीन इसे समझदारी से इस्तेमाल करेगा या नहीं।
Home / News / ईरान युद्ध में चीन की चालबाजी, रणनीति के तहत संघर्ष से दूर बीजिंग, पाकिस्तान को बनाया है मोहरा
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