
भगवान् राम जी का जीवन जहां अनेक आश्चर्यजनक घटनाआें से पूर्ण है वहीं उनकी महिमा के ढेरों प्रसंग मिलते हैं वहां कुछ प्रसंग ऐसेे भी हैं जाे बहुत राेचक हैं, उनमें जाे तर्क श्री राम के सन्मुख रखे गए उनसे राम निरन्तर हाे गए परन्तु उसमें भी राम की उदारता आैर महिमा ही प्रकट हाेती है।
जब श्री राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता जी काे खाेजते हुए जा रहे थे तो मार्ग में पड़ने वाले शिवरी के आश्रम में पहुंचे। उदार श्री राम जी ने उसे वह दुर्लभगति दी जहां से लाैटाना नहीं हाेता था। भगवान् ने शिवरी से कहा कि मेरे दर्शन का परम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप काे प्राप्त हाे जाता है। उसके बाद भगवान् ने शिवरी से पूछा कि यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती है ताे बता। शिवरी ने कहा-“जानत हाें पूछाे मति धीरा”
राम इस संकेत काे पाकर पम्पा नामक सराेवर की आेर चल दिए। जब राम जा रहे थे, उन्हें मार्ग में प्यास लगी। उन्हाेंने एक झटके से अपने तीर कमान उतार कर फेंक दिए आैर दूर पर बहते हुए सराेवर के पास जाकर निर्मल आैर शीतल जल पीने लगे। लाैटकर भगवान् ने धनुष काे उठाते समय देखा कि उनके धनुष से एक मेंढक घायल हाे गया है और वह लहूलुहान दशा में चुपचाप पड़ा था, राम जी काे दु:ख भी हुआ आैर कुछ आश्चर्य भी।
उन्हाेंने कहा, “जब तुम्हारे चाेट लगी थी, तुम चिल्लाए क्याें नहीं?”
मेंढक ने अपनी वेदना भरी आंखाें से राम जी की आेर देखा, थाेड़ा मुस्कुराया आैर फिर आंखें नीचे कर के बाेला, “महाराज जब पहले मुझे काेई दूसरा व्यक्ति सताता था ताे मैं अपनी रक्षा के लिए आपकाे पुकार लेता था परन्तु जब आप ही ने मुझे घायल किया ताे भला मैं क्या और किसे पुकारता?”
राम इस भक्त के तर्क काे सुनकर माैन हाे गए। उस मेंढक का यह प्रश्न ऐसा था जिसका उत्तर न तो राम दे सके न उनका काेई विद्वान भक्त ही दे सका।
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