
यह कहानी सूर्य की बेहिसाब एनर्जी के इस्तेमाल से जुड़ी है। चूंकि भारत में साल के आठ महीने तक जबरदस्त गर्मी पड़ती है, ऐसे में भारत इस मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में था, जिसके पास सूर्य की अपार ऊर्जा का सोर्स है। ऐसे में भारत ने इसका फायदा उठाने की सोची। उसने सोलर पैनलों के इस्तेमाल से सूर्य की ऊर्जा के बिजली बनाने में करना शुरू कर दिया। मगर, एक वक्त था, जब अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में अपने मनमुताबिक एक नियम बनवा लिया। भारत चाहता था कि डब्ल्यूटीओ उसे कोटा सिस्टम का इस्तेमाल करने की इजाजत दे दे, ताकि वह घर में बने सोलर पैनल का इस्तेमाल कर सके। मगर, अमेरिका के एक नियम के आगे भारत की अरसे तक नहीं चल पाई। उसे घरेलू स्तर सोलर मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री बनाने की इजाजत नहीं मिली। वहीं, इस सोलर पैनल बनाने के क्षेत्र में चीन बड़ा खिलाड़ी था, जिस वजह से भारत को सोलर पैनल काफी महंगे दामों में मिलते थे। मगर, भारत ने इन चुनौतियों से पार पाने की ठान ली। वेडनेसडे बिग टिकट में विश्व पृथ्वी दिवस के मौके पर भारत के सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वर्ल्ड लीडर बनने की कहानी जानते हैं। आज भारत के नेतृत्व में ISA की धाक इतनी जम गई है कि भारत दौरे पर आए दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जाय युंग भी इससे अछूते नहीं रह सके। यह भी जानेंगे कि 2026 के लिए वर्ल्ड अर्थ डे की थीम क्या रखी गई है।
जब भारत को मिला एक सच्चे दोस्त का साथ – भारत के दोस्त तो कई हैं, मगर उसे वर्ल्ड लीडर के रूप में देखना शायद ही कोई दोस्त चाहे। परमाणु शक्ति संपन्न फ्रांस इसी तरह का एक दोस्त निकला। बात 2015 की है, जब पेरिस जलवायु समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी। उसी दौरान भारत और फ्रांस ने संयुक्त रूप से ISA का ऐलान कर दुनिया को चौंका दिया।
तब फ्रांस का मानना था कि यह पहल भारत सरकार को इस समझौते को पूरा करने में मददगार साबित होगी। उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे भारत के लिए बड़ा अवसर माना। 2018 में पोलैंड में जब जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हो रहा था तो उस वक्त भी भारत ने सदस्य देशों के साथ तेजी से बैठकें कर रहा था।
ये बैठकें International Solar Alliance को लेकर ही की जा रही थीं, जिसके बारे में भारत सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले देशों को बता रहा था। हाल ही में भारत दौरे पर आए दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जाए म्युंग की मौजूदगी में पीएम नरेंद्र मोदी ने यह ऐलान किया कि दक्षिण कोरिया भी इंटरनेशनल सोलर अलायंस में शामिल होने जा रहा है।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस में कौन-कौन से देश – इंटरनेशनल सोलर अलायंस को शुरुआती दिनों में इस तरह से डिजाइन किया गया था कि इसमें ऐसे 121 देशों को रखा जा सके, जहां साल भर सूर्य की भरपूर रोशनी पड़ती हो।
खासतौर पर कर्क और मकर रेखा के बीच आने वाले देशों के लिए यह अलायंस ज्यादा मुफीद माना गया। इनमें से ज्यादातर देश बेहद गरीब हैं, जिनकी आबादी तो पूरी दुनिया की तीन-चौथाई थी, मगर दुनिया की कुल सौर क्षमता का 23 फीसदी इन्हीं के पास था।
जब जर्मनी जैसे देशों ने ISA में अपना इंटरेस्ट दिखाया तो 2018 के आखिर में एक बड़ा बदलाव किया गया। ISA को संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के लिए खोल दिया गया।
ISA के रूप में भारत में पहला ऐसा इंटरनेशनल हेडक्वॉर्टर्स है। ISA का मुख्यालय गुरुग्राम में बनाया गया है। आज इसके 125 सदस्य हो चुके हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा की चाहत रखते हैं।
ISA: 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश लक्ष्य – ISA का लक्ष्य 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हासिल करना है। इसके सभी सदस्य देशों के बीच 2030 तक अतिरिक्त सोलर कैपेसिटी को बढ़ाकर 1,000 गीगावाट तक ले जाना है।
ISA में केवल सरकारी फंडिंग को ही मंजूरी नहीं दी गई है, बल्कि इसमें प्राइवेट फंडिंग को भी बढ़ावा दिया गया है, ताकि गरीब से गरीब देश भी इसे अपना सकें।
ISA को लेकर सबसे ज्यादा फोकस अफ्रीकी देशों पर – ISA को लेकर सबसे ज्यादा फोकस अफ्रीकी देशों जैसे घाना, केन्या, सेनेगल, रवांडा और युगांडा में किया गया है। ISA की ओर से केन्या में सोलर इनीशिएटिव का विस्तार किया गया है। भारत के मध्य प्रदेश ने घाना में रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट की भी शुरुआत की है।
ISA से क्या भारत साध रहा भू-रणनीतिक समीकरण – ISA भले ही एक सोलर अलायंस हो, मगर इसके जरिए भारत ने अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के साथ-साथ दुनिया के कई देशों से अपने संबंध और बेहतर किए हैं।
भारत ने अफ्रीका के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और लैटिन अमेरिकी देशों को भी ISA में शामिल होने के लिए प्रेरित किया है। इसमें भारत के भूराजनीतिक हित भी हैं। भारत और फ्रांस ने इस अलायंस के जरिये क्लाइमेट और एनर्जी स्पेस के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत पर काफी जोर दिया है।
ISA को लेकर भारत की तीन बड़ी चुनौतियां क्या हैं –
ISA को लेकर भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
पहला, ISA को अपने ज्यादातर लक्ष्य हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। भारत को अपने घरेलू सोलर प्रोग्राम का लगातार विस्तार करके दुनिया को दिखाना होगा कि दुनिया को ISA की जरूरत क्यों है।
दूसरा, ISA को लेकर भारत को दुनिया को यह दिखाना होगा कि उसमें नेतृत्व करने की क्षमता है। वह दुनिया का सॉफ्ट पावर भी है।
तीसरा, भारत को अपनी इसी सॉफ्ट पावर के दमखम को ISA के लक्ष्यों को हासिल करने में लगाना होगा और वैश्विक समीकरणों को भी साधना होगा।
ISA: भारत के लिए चीन अब भी बड़ी चुनौती है
सोलर पैनल के प्रोडॅक्शन के मामले में चीन अब भी भारत के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। चीन अपने सोलर पैनलों के लिए बड़ी सब्सिडी देता है, जिससे उसका घरेलू बाजार काफी बढ़ गया है। भारत के लिए यह बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऐसे में चीन के सोलर पैनलों का मुकाबला करना टेढ़ी खीर बना हुआ है। 2018 में चाइनीज सोलर पैनलों पर 25 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगाने के बाद भी भारत के बाजारों में चाइनीज सोलर पैनल भरे पड़े हैं।
भारत ने एनर्जी एफीशिएंसी को बढ़ाने के लिए एक और सार्थक पहल की है। 2014 से ही उसने LED लाइट बल्ब के इस्तेमाल किए जाने पर जोर दिया। आज पूरे भारत में ऐसी लाइटों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। पहले ये एलईडी बल्ब महंगे होते थे, अब ये सस्ते हो गए हैं। लोगों में बिजली बचाने को लेकर जागरूकता बढ़ी है। यहां तक कि चीन पर भी इसका असर पड़ा और उसने सोलर पैनलों के दाम कम कर दिए।
वर्ल्ड अर्थ डे 2026 की थीम क्या है -वर्ल्ड अर्थ डे 2026 की थीम-Our Power, Our Planet रखी गई है। इसका मकसद है कि व्यक्तिगत, समुदायिक और सरकारी स्तर पर पर्यावरणीय प्रगति को ध्यान में रखते हुए अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ना। खासतौर पर सोलर और विंड एनर्जी की दिशा में आगे बढ़ना।
2026 के एजेंडे का एक मकसद यह भी है कि क्लाइमेट चेंज की चुनौतियों से निपटने के लिए अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल को तीन गुना तक बढ़ाना।
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