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सऊदी से लेकर ईरान तक, खाड़ी देशों में ही क्यों है व‍िशाल तेल भंडार, कहीं और क्यों नहीं बन पाया ‘खजाना’, जानें


ईरान में अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद दुनिया के बड़े हिस्से ने उर्जा संकट का अनुभव किया है। इसकी वजह ईरान का हमलों के जवाब में होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देना है। इसी समुद्री गलियारे के जरिए पश्चिम एशिया यानी अरब के मुल्कों से तेल और गैस बाकी दुनिया में पहुंचता है। ऐसे में भारत समेत दुनिया के कई देशों में तेल और गैस की कमी होने लगी है। इस सबके बीच यह सवाल उठता है कि आखिर पश्चिम एशिया की जमीन में ही इतने बड़े तेल भंडार क्यों हैं। साथ ही इस क्षेत्र के तेल की बहुत ज्यादा मांग और इस पर दुनिया की बहुत ज्यादा निर्भरता क्यों है।
तेल और गैस आज किसी भी शहर की जीवनरेखा हैं। कुछ दशक पहले तक कोई शहर बिना गैस और तेल के आसानी से गुजारा कर सकता था लेकिन आज एक छोटा गांव भी पेट्रोल-डीजल, एलपीजी के बिना नहीं चल पाएगा। यही वजह है कि दुनिया कि नजर ईरान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट पर लगी है। दुनिया का एनर्जी सप्लाइर बनने की अरब जगत (सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन) और ईरान की शुरुआत 100 साल से ज्यादा पुरानी है।
तेल मिलने की शुरुआत – इस क्षेत्र में तेल की पहली खोज 1908 में ईरान के मस्जिद-ए-सुलेमान में हुई थी। इस पहली खोज ने पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खोज-अभियानों को बढ़ावा दिया। इसके बाद इराक और पूरे अरब जगत में तेल खोजने की होड़ शुरू हुई और नतीजे में कई बड़ी खोजें क्षेत्र में हुईं। क्षेत्र में तेल की कुछ शुरुआती प्रमुख खोजें इस तरह से हैं।
ईरान (1908): मस्जिद-ए-सुलेमान
इराक (1927): बाबा गुरगुर (किरकुक)
बहरीन (1932): जेबेल दुखान
सऊदी अरब (1938): दम्माम
कुवैत (1938): बुरगान
कतर (1939–1940): दुखान
संयुक्त अरब अमीरात (1958): मुरबान बाब
करोड़ों साल पहले का अरब – अरब को रेत के टीलों और सूखे का पर्याय माना जाता है लेकिन इससे बहुत पहले यह ‘समुद्री क्रैडल’ था। करीब 10 करोड़ साल पहले इस क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा टेथिस महासागर के गर्म उथले विस्तार के नीचे डूबा हुआ था। यह पूरा इलाका प्लवक, शैवाल और सूक्ष्म जीवों से भरा हुआ था। इन्होंने ही एक गाढ़ा जैविक मिश्रण तैयार किया, जो आज के वक्त में तेल के रूप में वैश्विक अर्थव्यवस्था की बुनियाद बना हुआ है।
करोड़ों वर्ष पहले क्षेत्र के जीव मरकर समुद्र तल में समा गए और विशाल ऑक्सीजन-रहित परतों के रूप में जमा हो गए। समय के साथ तलछट ने इस जैविक पदार्थ को पूरी तरह ढक लिया और भारी दबाव के कारण इसे कसकर दबा दिया। इसके बाद का काम तेज गर्मी ने किया। गर्मी ने इस सड़ते हुए पदार्थ को हाइड्रोकार्बन में बदला। यानी आज का रेगिस्तान कभी एक जैव-रासायनिक इंजन था, जिसे सूरज ने ईंधन में बदला।