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वन नेशन-वन इलेक्शन पर भड़के पी चिदंबरम, बोले- यह असंवैधानिक, मेरा जमीर इसके समर्थन की इजाजत नहीं देता


पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को लेकर एक बार फिर पुरजोर विरोध किया है। उन्होंने सोमवार को संसद की संयुक्त समिति के समक्ष इस विचार को विकृत और असंवैधानिक करार दिया है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत निर्वाचित विधानसभाओं और संसद के कार्यकाल को कम करना संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन होगा। वहीं, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने भी प्रस्तावित ढांचे में व्यापक बदलाव और कई सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई।
चिदंबरम को संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और ONOE से जुड़े अन्य विधेयकों की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के समक्ष अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया था। विधि सेंटर की ओर से स्वप्निल त्रिपाठी ने भी समिति के सामने प्रस्तुति दी।
‘मेरा जमीर इसके समर्थन की इजाजत नहीं देता’ – सूत्रों के अनुसार, चिदंबरम ने समिति से कहा कि एक साथ चुनाव कराने से संबंधित विधेयक असंवैधानिक हैं। उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक विधानमंडल का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए होता है और उसके कार्यकाल को कम करना संविधान के मूल ढांचे का सीधे तौर पर उल्लंघन होगा। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि उनकी अंतररात्मा उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देती। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार के पास कानून पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं है।
समिति की सदस्य और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता सागरिका घोष ने भी विधेयक का विरोध किया और कहा कि इससे निर्वाचन आयोग को बेलगाम अधिकार मिल जाएंगे।
करीब 10 पद्म पुरस्कार से सम्मानित हस्तियों के एक समूह ने भी समिति के समक्ष अलग-अलग अपनी राय रखी। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे। पद्म पुरस्कार से सम्मानित कुछ लोगों ने एक साथ चुनाव कराने की पहल का समर्थन किया, जबकि अन्य ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे देश में अराजकता पैदा हो सकती है।
विधि सेंटर ने भी उठाए संवैधानिक सवाल – विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने प्रस्तावित ONOE व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलावों की जरूरत बताई। संस्था ने कहा कि मौजूदा प्रारूप को संवैधानिक जांच में टिकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों और दोबारा मसौदा तैयार करने की आवश्यकता है।
विधि सेंटर ने प्रस्तावित अनुच्छेद 82A(3) पर भी सवाल उठाया। इसके तहत चुनाव आयोग को ONOE लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव करने की शक्ति मिलने की बात कही गई है। संस्था के अनुसार, इससे संसद की संविधान संशोधन की शक्ति अप्रत्यक्ष रूप से किसी अन्य संस्था को सौंपने का सवाल पैदा हो सकता है और यह संविधान की मूल संरचना के खिलाफ जा सकता है। साथ ही, चुनाव से जुड़े प्रावधानों में बदलाव की शक्ति चुनाव आयोग को देने से हितों के टकराव की आशंका भी जताई गई।
संस्था ने दिए सुझाव – संस्था ने सुझाव दिया कि राज्य विधानसभा चुनाव टालने के आधार स्पष्ट रूप से तय किए जाएं। इसके अलावा राष्ट्रपति शासन के दायरे को सीमित करने और राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया।
कब पेश किए गए थे विधेयक – ये विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे, जिसके बाद इन्हें विचार के लिए संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया था।
इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कोविंद की अध्यक्षता वाली इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य थे।