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मक्का पैक्ट में शामिल होने से मिलेगी जन्नत, बांग्लादेशी सेना में अफवाह, तारिक को भारत ने एन वक्त पर रोका- खुलासा


बांग्लादेश में 2024 में सत्ता परिवर्तन में शामिल कुछ लोग 5 अगस्त को ‘मक्का पैक्ट’ में शामिल होकर आजादी की दूसरी वर्षगांठ मनाना चाहते थे। खबरों के मुताबिक पाकिस्तान के अनुरोध पर ही इस तारीख को अलायंस की सार्वजनिक शुरुआत के लिए चुना गया था। यह भारत से तथाकथित ‘दूसरी आजादी’ का जश्न मनाने के लिए बहुत सोच-समझकर उठाया गया कदम था। सऊदी अरब के प्रधानमंत्री सलमान बिन अब्दुल अजीज से अनुरोध किया गया था कि वे बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को इसके लिए सहमत करें।
इस महीने ढाका में सऊदी अरब के राजदूत ने तारिक रहमान से मुलाकात की है। सऊदी ने बताया है कि तारिक रहमान को रियाद यात्रा का न्योता दिया गया है। माना जा रहा है कि इस दौरान सऊदी तारिक रहमान से मक्का समझौते में शामिल होने के लिए कहेगा। नॉर्थ इस्ट न्यूज, जिसकी बांग्लादेश की राजनीति में गहरी पैठ है उसने ये जानकारी दी है।
क्या बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल होने वाला था? – नॉर्थ इस्ट न्यूज ने बताया है कि आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान को यह बताया गया कि राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन को पहले ही इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जा चुका है और BNP सरकार उन्हें भी हटा देगी। इसी माहौल में 19 जुलाई को आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान पांच दिन की सरकारी यात्रा पर तुर्की गए थे। उसी दोपहर सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री सलमान बिन अब्दुल अज़ीज ने तारिक रहमान को सरकारी यात्रा के लिए आमंत्रित किया।
रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश के आर्मी चीफ की तुर्की यात्रा के दौरान तारिक को रियाद ले जाने की कोशिश की गई थी। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब को यह भी बताया था कि तारिक जुलाई के आखिरी हफ्ते में रियाद का दौरा करेंगे। हालांकि भारत की कूटनीतिक कोशिशों के बीच दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर 30 जुलाई को ढाका पहुंचे। मुख्य रूप से उनकी कूटनीतिक पहल की वजह से ही बांग्लादेश ने ‘मक्का सैन्य गठबंधन’ में शामिल होने पर हो रही बातचीत से कुछ समय के लिए कदम पीछे खींच लिए।
क्या तारिक रहमान मक्का पैक्ट पर करने वाले थे दस्तखत? – लेकिन गोर के भारत लौटने के तुरंत बाद 3 अगस्त को जनरल जमान ने ढाका के जलसिरी रिहायशी प्रोजेक्ट इलाके में आर्मी इंटरनेशनल इस्लामिक इंस्टीट्यूट (AIII) का उद्घाटन किया। इसी दौरान वीडियो टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उन्होंने बारीसाल, सावर, बोगुरा, सिलहट, चट्टोग्राम, कुमिला और जशोर में बनने वाले ‘आर्मी इंटरनेशनल इस्लामिक इंस्टीट्यूट’ की आधारशिला रखी। इन इस्लामिक संस्थानों के निर्माण के लिए तुर्की ने मदद और फंडिंग दी थी।
उसी दिन यानी 3 अगस्त को यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफ़िक कमांड के एडमिरल स्टीफन टी. कोहलर एक बड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ ढाका पहुंचे। अमेरिकी नौसेना के कुछ अधिकारियों ने नौसेना प्रमुख के तौर पर हाल ही में नियुक्त हुए एडमिरल खोंडोकर मिसबाह-उल-अज़ीम से मुलाक़ात की। उस दिन अमेरिकी पैसिफिक कमांड के प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान मक्का मिलिट्री अलायंस में बांग्लादेश के संभावित शामिल होने पर विस्तार से चर्चा हुई।
भारत की RAW के प्रमुख पराग जैन भी अपने तीन सहयोगियों के साथ ढाका पहुंचे ताकि सरकार को ‘महत्वपूर्ण जानकारी’ सौंपी जा सके। बताया जाता है कि उन्होंने महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी साझा की और बांग्लादेश के सरकार प्रमुख को ‘अलोकतांत्रिक ताकतों’, ‘मक्का मिलिट्री अलायंस’ और ‘सरकार को गिराने की साज़िश’ के बारे में आगाह किया।
तारिक रहमान 21 अगस्त को आने वाले थे भारत – नॉर्थ इस्ट न्यूज ने बताया है कि रॉ चीफ की यात्रा के बाद बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने लगभग दो महीने के इंतजार के बाद तारिक रहमान से मुलाकात की। इस मुलाकात के ठीक बाद ही भारत और बांग्लादेश के विदेश मंत्रालयों के बीच एजेंडा-स्तर पर बातचीत शुरू हुई। इसके बाद 21 अगस्त को तारिक रहमान के भारत दौरे की तारीख तय हो गई और ताज पैलेस होटल में बुकिंग भी करा ली गई थी।
लेकिन 14 अगस्त को आर्मी चीफ जमान दक्षिण सूडान और अब्येई की पांच दिन की यात्रा पूरी करने और संयुक्त राष्ट्र के शांति-रक्षा मिशन वाले इलाकों का निरीक्षण करने के बाद वापस ढाका लौट आए और इसी के बाद तारिक रहमान की भारत यात्रा पर ग्रहण छाने लगे। इसके बाद 2024 में सत्ता परिवर्तन करवाने वाला गुट एक्टिव हो गया जिसने तर्क दिया कि बांग्लादेशी सेना का अस्तित्व ही भारत के विरोध पर टिक सकता है। और फिर तारिक रहमान का दिल्ली दौरा रद्द हो गया।
‘मक्का पैक्ट से जन्नत का रास्ता खुलेगा’ – पिछले दो हफ्तों में बांग्लादेश की सेना में एक अफवाह फैलाई गई है कि मक्का समझौते में शामिल होने से ‘जन्नत जाने की गारंटी मिलेगी।’ सैन्य सूत्रों का कहना है कि मुसलमानों के बीच ‘मक्का’ नाम के भावनात्मक महत्व का फायदा उठाकर सशस्त्र बलों के सदस्यों को इस गठबंधन के पक्ष में करने की कोशिश की जा रही है। इस प्रचार अभियान में कुछ बर्खास्त सैन्य अधिकारी अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह संदेश फैलाया जा रहा है कि अगर बांग्लादेश को भारतीय प्रभुत्व से मुक्त होना है तो मक्का सैन्य गठबंधन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।