
केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी अपनी बेबाक बयानी के लिए जानी जाती हैं। ऐक्टिंग वाले दिनों में उन्होंने ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के जरिए लोकप्रियता का शिखर चूमा। राजनीति में आईं तो शुरुआती संघर्षों के बाद वह करिश्मा कर दिया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल थी। गांधी परिवार के सबसे मजबूत गढ़ अमेठी में राहुल गांधी को शिकस्त। फर्श से अर्श का सफर किसे कहते हैं, ये जानना हो तो स्मृति इरानी को देख लें। बचपन ऐसी गरीबी में बीता कि मां-बाप के पास स्कूल के फीस देने लायक भी पैसे नहीं थे। इरानी ने एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ हालिया इंटरव्यू में अपने बचपन के अनसुने किस्सों को बताया है। कैसे उनके मां-बाप अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के थे और इसका उनके जीवन पर क्या असर पड़ा? कैसे अभावों में बचपन कटा? आदि।
स्मृति इरानी ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा, ‘दिल्ली में मैं मलाई मंदिर से करीब 2 किलोमीटर दूर टेंट वाले स्कूल पैदल जाती और आती थी। स्कूल पांचवीं तक था। उसी के पास एक बड़ा मिशनरी स्कूल था जो बारहवीं तक था। मैं सोचा करती थी कि इस स्कूल में कैसे दाखिला होता होगा? पता चला कि पहले टेस्ट देना पड़ता है। टेस्ट निकालने के बाद एडमिशन होता है। लेकिन परिवार की स्थिति ऐसी थी कि टेस्ट पास भी कर लेते तो दाखिला नहीं होता, क्योंकि फीस चुकाने की स्थिति नहीं थी। उस समय तक मेरे माता-पिता अलग हो चुके थे और मेरी मां उतना फीस चुका पाने की स्थिति में नहीं थीं। मेरी मां ने कहा कि अगर टेस्ट में पास हो जाती हो तब भी एडमिशन नहीं हो पाएगा क्योंकि फीस नहीं दे पाऊंगी। उस समय मेरी मां होटल ताज मान सिंह में हाउसकीपर के तौर पर काम करती थीं। तब हाउसकीपिंग डिपार्टमेंट की हेड जूही चावला की मां थी। तब यह खबर खूब चर्चा में थी कि मिसेज चावला की बेटी मिस इंडिया हो गई है। उस समय टाटा का ये प्रोजेक्ट था कि अगर आप 60 प्रतिशत से ज्यादा मार्क लाते हैं तो वे कर्मचारियों के बच्चों के पढ़ाई का खर्च उठाएंगे। मैंने टेस्ट पास किया और एडमिशन हो गया।’
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