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CWG 2026 में 39 मेडल से बढ़ा भारत का हौसला, फिर भी ओलंपिक मेडल की मंजिल अभी दूर


कॉमनवेल्थ खेलों में भारत की उपलब्धियां केवल स्वर्ण पदकों तक सीमित नहीं मानी जा सकतीं। कई रजत और कांस्य पदक भी ऐसे हैं, जिन्हें महत्व भले ही कम दिया जाता है, लेकिन वे भविष्य की बड़ी संभावनाओं का संकेत देते हैं। बॉक्सिंग, जूडो, एथलेटिक्स, वेटलिफ्टिंग और पैरा खेलों में भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया है। पर, सवाल यह है कि क्या केवल इनसे सितंबर में होने वाले एशियाई खेलों और 2 साल बाद होने वाले ओलंपिक्स के लिए कोई बड़ी उम्मीद बंधती दिखती है?
प्रतिस्पर्धा की कमी – कॉमनवेल्थ खेलों की बॉक्सिंग स्पर्धा में इस बार टक्कर पहले जितनी कड़ी नहीं थी। जैस्मिन लम्बोरिया, अरुंधति चौधरी और ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ही वर्ल्ड चैम्पियनशिप के मेडलिस थे। जैस्मिन और अरुंधति ने चैम्पियन की तरह सभी मुकाबले जीते, जबकि लवलीना उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं।
कोच की मेहनत – भारत की स्वीडिश महिला कोच सैंगियागो निएवा और पुरुष टीम के कोच कुटप्पा की कड़ी मेहनत रंग लाई। पिछले वर्षों में इसी खेल में कई कॉन्टिनेंटल चैम्पियन, ओलंपियन और वर्ल्ड चैम्पियनशिप के मेडलिस्ट मुक्केबाजों की संख्या कहीं अधिक थी।
बेस्ट से पीछे – वेटलिफ्टिंग में भारत को एक गोल्ड, छह सिल्वर, एक ब्रॉन्ज हासिल हुए, लेकिन एक कड़वी हकीकत यह भी है कि इन आठ पदक विजेताओं में से पांच वेटलिफ्टर अपने पर्सनल बेस्ट या राष्ट्रीय रिकॉर्ड से काफी पीछे रहे। वहीं, महिलाओं में ज्ञानेश्वरी देवी और हरजिंदर कौर, पुरुषों में लवप्रीत सिंह ने सिल्वर मेडल के साथ अपना पर्सनल बेस्ट दिया। बाकी 5 पदक विजेताओं को कड़ी टक्कर की कमी का फायदा मिला।
नई उम्मीद – कॉमनवेल्थ खेलों में जूडो को 1990 में शामिल किया गया था, लेकिन भारत को पहला स्वर्ण अब जाकर मिला। पहले शीर्ष खिलाड़ी एशियाई खेलों में उतरते थे, बाकी कॉमनवेल्थ गेम्स में खेलते थे क्योंकि ये एक ही साल में होते हैं। हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अवसरों में इजाफा, खिलाड़ियों की फिटनेस का बेहतर होना और निजी संस्थाओं का बढ़िया कोचिंग देना जैसे कारणों से प्रदर्शन में अच्छा सुधार हुआ। अब जरूरत ग्रासरूट लेवल पर आला दर्जे की कोचिंग सुविधाएं मुहैया करवाने की है।
जैवलिन में शुभ संकेत – जैवलिन थ्रो में श्रीलंका के सुमेश थंग ने बड़ी चुनौती रखी। नीरज चोपड़ा ने सिल्वर जीता। ब्रॉन्ज मेडल के लिए यशवीर सिंह का उभरना शुभ संकेत है। 85 मीटर से अधिक दूर जैवलिन फेंककर उन्होंने अपना पर्सनल बेस्ट दे इतिहास रच दिया। एथलेटिक्स में गुलवीर सिंह को 10,000 मीटर में सिल्वर और 5,000 मीटर में ब्रॉन्ज जीतने वाले पहले भारतीय होने का गौरव हासिल हुआ। वहीं, तेजस्विन शंकर डिकेथलॉन में ब्रॉन्ज जीतने वाले पहले भारतीय बने। ट्रिपल जंप में भारत गोल्ड नहीं बचा सका पर बाकी के दोनों मेडल जीतकर उम्मीदें जरूर जगाईं।
पैरा-एथलीट कमाल – बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में लॉन बॉल में महिलाओं ने फोर (4) स्पर्धा का गोल्ड और पुरुषों ने सिल्वर जीता था। लेकिन, इस बार इंग्लैंड, नॉर्दर्न आयरलैंड और मलेशिया बेहतर तैयारी के साथ उतरे। भारतीय टीम निरंतरता बनाए नहीं रख सकी और पदक की दौड़ से बाहर हो गई। जिम्नास्टिक के वॉल्ट इवेंट में पिछले वर्षों में उम्मीदें जगी थीं, लेकिन इस बार निराशा हाथ लगी। स्विमिंग, पैरा बास्केटबॉल और साइकिलिंग में पहले की तरह मेडल से काफी दूर रहे। एथलेटिक्स की जिस 100 मीटर रेस में हम पिछले दिनों घर के ही शेर बनकर रह गए, उसी इवेंट में पैरा एथलीटों ने गोल्ड और सिल्वर जीतकर इतिहास रच दिया।
लंबा सफर बाकी- अगर पेरिस ओलंपिक्स के नतीजों को आधार बनाया जाए, तो कॉमनवेल्थ में पदक जीतने वाले कई भारतीय एथलीट विश्व के शीर्ष स्तर से पीछे हैं। मुरली श्रीशंकर का लॉन्ग जंप प्रदर्शन उन्हें छठे, सर्वेश कुशारे का हाई जंप में प्रदर्शन उन्हें नौवें, प्रवीण चित्रावाल ट्रिपल जंप में 11वें और गुलवीर सिंह को उनका प्रदर्शन 10 हजार मीटर में 18वें व 5 हजार मीटर में 16वें स्थान तक ही पहुंचा पाता। इन सब एथलीटों को ग्लासगो में सिल्वर मेडल हासिल हुए थे। ओलंपिक्स स्तर तक पहुंचने के लिए अभी लंबा सफर तय करना बाकी है।