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पति पर रेप का केस कैसे चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल


सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई 3 हफ्ते बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब कानून में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद मौजूद है तो पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में पति पर मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है?
कब चलाया जा सकता है मुकदमा? – पीठ ने पूछा कि जब तक वैवाहिक बलात्कार अपवाद ( Marital Rape Exception) की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी पति के खिलाफ पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में अभियोजन कैसे चलाया जा सकता है। यह सवाल कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के संदर्भ में उठा, जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक बलात्कार के मामले में पति को कानून के तहत पूरी छूट हासिल नहीं है। पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर उसके खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है।
किस धारा में मौजूद है अपवाद? – जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट अपवाद की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं करता, तब तक क्या अभियोजन की अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि कोर्ट पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अभियोजक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चला सकता है, जब IPC की धारा 375 में स्पष्ट रूप से अपवाद मौजूद था।
IPC की जगह अब BNS लागू – मामला IPC की धारा 375 के अपवाद- 2 से जुड़ा है। अब IPC की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू है। इसमें भी विवाहित महिला से संबंधित यौन संबंध को लेकर समान प्रावधान है, यदि पत्नी 18 साल से कम उम्र की नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम सुनवाई में 2 प्रमुख सवालों पर विचार होगा। पहला, यदि वैवाहिक बलात्कार अपवाद बरकरार रहता है तो क्या पति के खिलाफ अभियोजन जारी रखा जा सकता है। दूसरा, क्या यह अपवाद ही संवैधानिक रूप से कायम रह सकता है।
केंद्र ने अपराध बनाने का किया था विरोध – केंद्र ने 2024 में दाखिल हलफनामे में वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने का विरोध किया था। उसका कहना था कि विवाहित महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए मौजूदा कानूनों में पर्याप्त वैकल्पिक उपाय है। केंद्र के मुताबिक, विवाह संस्था के भीतर बलात्कार का अपराध लागू करना अत्यधिक कठोर और असंगत हो सकता है। उसने इसे मुख्य रूप से सामाजिक, विधायी नीति का विषय बताया था।