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अधिकार सर्वोपरि’: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग रेप पीड़िता की इच्छा के खिलाफ नहीं थोप सकते गर्भ


सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग रेप सर्वाइवर के 30 हफ्ते के गर्भावस्था की मेडिकल टर्मिनेशन के मामले में अपना पिछला फैसला बहाल रखा। उसने कहा कि टर्मिनेशन का निर्णय पीड़िता के परिजन करें। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सही फैसला किया है। उसने 24 अप्रैल को मेडिकल टर्मिनेंसी की अनुमति दी थी, जिसके खिलाफ एम्स ने क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल की थी। अदालत ने बुधवार को इसे खारिज कर दिया।
संवेदनशीलता की जरूरत: इस फैसले के सामाजिक आयाम भी हैं। समाज अनब्याही नाबालिग या महिला के गर्भपात कराने को लांछन समझता और उन्हें ताउम्र प्रताड़ित करता है। ऐसी मां जिस शिशु को जन्म देती है, उसे भी सामाजिक उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इसलिए ऐसे मामलों में समाज से और संवेदनशील होने की अपेक्षा की जानी चाहिए।
एम्स का तर्क: सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह उसके 24 अप्रैल के निर्णय को मानने के बजाय एक नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों का हनन करना चाहता है। उसने फैसले में कहा था कि यूं तो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 गर्भाधान के 24 हफ्तों के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं देता, लेकिन सिर्फ इस आधार पर मौजूदा केस में पीड़िता के संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।
क्या कहता है कानून: संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि अपने शरीर , खासतौर से प्रजनन के मामलों में, की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का पालन होना चाहिए। किसी भी अदालत को किसी महिला और उससे भी बढ़कर एक नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध, गर्भ को पूर्ण अवधि तक रखने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। ऐसा करना स्त्री के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होगा।
अवैध गर्भपात का डर: अदालत के मुताबिक, गर्भपात की कानूनी अनुमति न मिलने से ही पीड़िता अक्सर खतरनाक रास्तों का चुनाव कर अवैध गर्भपात केंद्रों की ओर रुख करते हैं। इस मामले में तो यह नाबालिग दो बार खुदकुशी का प्रयास भी कर चुकी है। वहीं, एम्स की दलील थी कि गर्भावस्था के लगभग अंतिम चरण में अबॉर्शन की कोशिश असफल भी रह सकती है। इससे न सिर्फ नाबालिग की जान को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है बल्कि उसके भविष्य में मां बनने की क्षमता भी खत्म हो सकती है।