
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह विपक्ष के निशाने पर हैं। उनकी नई सरकार पर नेपाल की संसद को कमजोर करने के आरोप लग रहे हैं। दरअसल, नेपाल सरकार ने संसद सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर अध्यादेशों की बाढ़ ला दी है। इससे विपक्षी दल भड़के हुए हैं। इससे पहले उम्मीद की जा रही थी कि बालेन शाह सरकार जल्द ही बजट सत्र बुला सकती है, लेकिन रातों-रात इसे स्थगित कर दिया गया। मंगलवार को नेपाली कैबिनेट ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को सहकारिता और संवैधानिक परिषद से संबंधित दो अध्यादेशों को मंजूरी देने की सिफारिश की थी।
नेपाल में अध्यादेशों की बाढ़ – इसके एक दिन बाद, विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य सेवा और मौजूदा नेपाली कानूनों में संशोधन से संबंधित अतिरिक्त अध्यादेश भी राष्ट्रपति को मंजूरी के लिए भेजे गए। सूत्रों के अनुसार, सरकार सिविल सेवा सुधारों से संबंधित एक और अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही है। इस कदम से व्यापक आलोचना शुरू हो गई है, जिसमें विपक्षी दल और संविधान के जानकार सरकार पर संसद को दरकिनार करने और लोकतांत्रिक मानदंडों को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं।
नेपाली संसद के सत्र पर भी संकट – नेपाली संसद का सत्र दोबारा कब शुरू होगा, इस पर अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि बालेन शाह सरकार ने पहले 30 अप्रैल से संसद सत्र बुलाने की सिफारिश की थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसने अपना फैसला बदल दिया और बैठक स्थगित कर दी। नेपाली संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का अध्यादेशों पर निर्भर रहना—भले ही उसके पास लगभग दो-तिहाई बहुमत हो—संसदीय प्रक्रियाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करता है।
संविधान के जानकारों ने उठाए सवाल – संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, किसी भी अध्यादेश को सदन का सत्र शुरू होने के 60 दिनों के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। ऐसा न होने पर, वह अध्यादेश अपने आप ही निष्प्रभावी हो जाता है। नेपाल में अतीत में भी ऐसे ही उदाहरण देखने को मिले हैं। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में लाए गए अध्यादेश भी संसदीय मंजूरी न मिलने के कारण निष्प्रभावी हो गए थे, विशेष रूप से सदन के विघटन के बाद।
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