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सुप्रीम कोर्ट ने दी 7 माह के गर्भपात की अनुमति, कहा- नाबालिग पर मातृत्व जबरन नहीं थोप सकते, 5 अहम बातें


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसले में कहा कि किसी महिला को केवल इस आधार पर अवांछित गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सबसे अहम गर्भवती महिला की इच्छा, गरिमा और मानसिक शारीरिक कल्याण है, न कि केवल अजन्मे बच्चे के भविष्य की संभावना। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की 7 माह से अधिक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने 15 वर्षीय लड़की को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी की अनुमति दी। नाबालिग सात महीने से अधिक की गर्भवती है। कोर्ट ने कहा, खासकर नाबालिग को उसकी स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध गर्भ को पूर्ण अवधि तक ढोने के लिए बाध्य करना गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुंचा सकता है। यह कहना आसान है कि यदि गर्भवती महिला बच्चे का पालन-पोषण नहीं करना चाहती तो वह जन्म के बाद उसे गोद दे सकती है, पर यह तर्क ऐसे मामलों में स्वीकार्य नहीं हो सकता जहां गर्भावस्था स्वयं अवांछित हो। महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना उसके कल्याण को नजरअंदाज करना होगा और उसे अजन्मे बच्चे के हितों के अधीन कर देगा।