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राष्ट्रपति भवन और राखी का इतिहास है दिलचस्प, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, कलाम से लेकर राधाकृष्णन तक की यादें हैं जुड़ीं


सुभद्रा देवी अब 104 साल की हो चुकी हैं। कुछ साल पहले तक वह बहुत उत्साह के साथ बतातीं कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समय राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता था। उनकी यादें आज भी उन पुरानी तस्वीरों को ताजा कर देती हैं, जब राष्ट्रपति भवन एक बड़े परिवार जैसा लगता था।
राखियां और उपहार। 1950 के दशक में सरोजिनी नगर और नेताजी नगर की महिलाएं-लड़कियां राष्ट्रपति को राखी बांधने जाती थीं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पत्नी राजवंशी देवी प्रसाद उनका स्वागत करतीं। इस मौके पर नई दिल्ली के कई स्कूलों की लड़कियां भी आती थीं। वक्त के साथ राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों की बेटियां भी इसमें शामिल हो गईं। राजेंद्र प्रसाद सबको उपहार देते। कुछ देर सबके साथ रहने के बाद वह अक्सर चले जाते थे, पर राजवंशी देवी वहीं रुकी रहतीं। वह देर तक लोगों से बातें करतीं। बच्चे उन्हें मां जी कहते थे।
बच्चों की बातें। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन यह त्योहार अमृत उद्यान में मनाते थे। पहले इसका नाम मुगल गार्डन था। डॉ. जाकिर हुसैन भी स्कूली छात्राओं और कर्मचारियों की बेटियों से राखी बंधवाते। वह बच्चों के साथ देर तक बैठे रहते, उनकी बातें सुनते। 1992 से 1997 तक राष्ट्रपति रहे डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने भी यह परंपरा निभाई।
कलाम के सवाल। राशिदा अहमद का बचपन राष्ट्रपति भवन में बीता। वह केंद्र सरकार के एक विभाग में काम करती हैं। उन्होंने शंकर दयाल शर्मा को राखी बांधी है। वह बताती हैं कि राष्ट्रपति की पत्नी स्कूली बच्चों को मिठाई और तोहफे दिया करती थीं। आगे के दौर में चलें तो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम राखी बंधवाते और फिर बच्चों से उनकी हॉबीज से जुड़े सवाल पूछते। वह जिस जिज्ञासा से सवाल करते, वह बच्चों को बहुत अच्छा लगता था।
सामाजिक संदेश। रामनाथ कोविंद और द्रौपदी मुर्मु ने भी इस परंपरा को जीवित रखा। रामनाथ कोविंद ने कोविड की दूसरी लहर के बाद उन नर्सों के साथ भी रक्षाबंधन मनाया था, जो उस भयानक समय में रोगियों का इलाज कर रही थीं। द्रौपदी मुर्मु सरकारी स्कूल, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय और कस्तूरबा गांधी विद्यालय की लड़कियों के साथ यह पर्व मनाती हैं। उन्होंने एक बार बच्चियों से पेड़ लगाने की अपील भी की थी।
सांस्कृतिक विरासत। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो पहल शुरू की थी, बाद के राष्ट्रपति ने उसे अपनाया और उस पर अपनी छाप छोड़ी। कोई शिक्षा पर बात करता था, कोई स्टाफ के साथ समय बिताता था, कोई सेवा करने वालों का सम्मान करता था। हर राष्ट्रपति ने इसमें अपना रंग भरा। सिर्फ औपचारिकता नहीं, यह राष्ट्रपति निवास का सांस्कृतिक इतिहास है। आज जब राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन मनाया जाता है, तो उसमें पुरानी सादगी और नई सोच, दोनों की झलक मिलती है।
सुभद्रा देवी अब 104 साल की हो चुकी हैं। कुछ साल पहले तक वह बहुत उत्साह के साथ बतातीं कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समय राष्ट्रपति भवन में रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता था। उनकी यादें आज भी उन पुरानी तस्वीरों को ताजा कर देती हैं, जब राष्ट्रपति भवन एक बड़े परिवार जैसा लगता था।