
एनआरआई जोड़ों के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर होने वाले विवाद अक्सर अंतरराष्ट्रीय कानूनी लड़ाई का रूप ले लेते हैं। ऐसी स्थिति में, जब एक पक्ष को विदेशी अदालत से अपने पक्ष में आदेश मिल जाता है, जबकि दूसरा पक्ष भारतीय अदालत का दरवाजा खटखटाता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय अदालतों को स्वतंत्र रूप से यह तय करना चाहिए कि बच्चे के लिए क्या बेहतर है। विदेशी अदालत के फैसले को अपने आप नहीं मान लेना चाहिए, हालांकि, उस पर उचित विचार जरूर किया जाना चाहिए।
इन मामलों का निपटारा करना आसान नहीं होता – जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि ऐसे मामले बार-बार उनके सामने आ रहे हैं जिन पर विदेशी अदालतें पहले ही फैसला सुना चुकी हैं। इन मामलों का निपटारा करना आसान नहीं होता, क्योंकि इनमें बेहद भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दे शामिल होते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के कल्याण को “सबसे व्यापक अर्थ में समझा जाना चाहिए, न कि केवल पैसे या भौतिक सुख-सुविधाओं के नजरिए से”।
यह स्थिति दो आधारों पर टिकी है। पहला यह कि एक बार जब कोई मामला अदालत के सामने आता है, तो वह अपने ‘पेरेन्स पैट्रिया’ अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करती है। इस अधिकार क्षेत्र के तहत अदालत का यह कर्तव्य है कि वह बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए खुद मामले पर विचार करे और उसका आकलन करे। दूसरा यह कि ऐसे मामलों में फैसला पक्षों के कानूनी अधिकारों के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के कल्याण के आधार पर लिया जाता है।
कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े भारतीय कानून बच्चे के कल्याण पर ही आधारित – कस्टडी और संरक्षकता से जुड़े हमारे कानूनों में भी कानूनी अधिकारों के बजाय बच्चे के कल्याण पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। ये कानून स्पष्ट करते हैं कि भले ही कोई व्यक्ति कस्टडी या संरक्षकता पाने का कानूनी हकदार हो, फिर भी उसे यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए, अगर इससे बच्चे का कल्याण न होता हो। इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी विदेशी अदालत के आदेश के मुकाबले बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि दूसरे शब्दों में कहें तो, इस देश की कोई अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय, किसी विदेशी अदालत के आदेश का आंख मूंदकर पालन नहीं कर सकती और न ही वह केवल उस आदेश को लागू करने वाली अदालत (एक्जीक्यूटिंग कोर्ट) बनकर रह सकती है।
विदेशी अदालत के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई माता-पिता विदेशी अदालत के आदेश को नहीं मानते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय अदालत को उस आदेश को अपने आप लागू कर देना चाहिए। साथ ही, बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखने का यह मतलब भी नहीं है कि विदेशी अदालत के आदेश को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाए।
पीठ ने कहा कि बच्चे के कल्याण के लिए क्या जरूरी है, यह तय करते समय अदालत को अपना स्वतंत्र फैसला लेना चाहिए। हालांकि, ऐसा करते समय उसे विदेशी अदालत के आदेश को भी उचित महत्व देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश देते हुए निर्देश दिया कि सात साल की एक बच्ची, जो अमेरिकी नागरिक है और जिसे उसकी मां कैलिफोर्निया की कस्टडी (संरक्षण) संबंधी अदालत के आदेश का उल्लंघन करके भारत ले आई थी, उसे वापस अमेरिका भेज दिया जाए।
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