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ईरान की जंग में ट्रंप ने अमेरिका को हराया, सीजफायर को मजबूर हुआ सुपरपावर, एक्सपर्ट से समझें


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब धमकी दी कि आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी, तो पूरी दुनिया हिल गई। अगर यह धमकी सच में पूरी होती, तो ट्रंप का नाम इतिहास में 13वीं सदी के मंगोल शासक ओगेदेई खान के साथ लिखा जाता। ओगेदेई के हमलों ने फारसी सभ्यता को मिटा देने के कगार पर ला दिया था। हमले जारी। ट्रंप हालांकि अपनी ही तय की हुई डेडलाइन से पीछे हट गए और ईरान के साथ दो हफ्ते के संघर्ष विराम का ऐलान किया। वैसे सच यह भी है कि सीजफायर घोषित होने के बावजूद धमकियां और हमले जारी हैं। इजरायल अब लेबनान पर पहले से ज्यादा बम बरसा रहा है और ट्रंप ने कह दिया है कि अमेरिकी सेना क्षेत्र में तैनात रहेगी।
अधूरे लक्ष्यों के साथ युद्धविराम – इस पूरे घटनाक्रम से अमेरिकी सैन्य क्षमता की विश्वसनीयता को जबरदस्त धक्का लगा है। ईरान में ट्रंप बहुत बड़े लक्ष्य लेकर उतरे थे – इस्लामिक शासन को गिराना, मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना और होर्मुज स्ट्रेट पर मंडरा रहे खतरे को हटाना। 40 दिनों की बमबारी के बाद तस्वीर यह है कि तेहरान में अब भी इस्लामिक रेजीम है, ईरान की मिसाइल क्षमता को नुकसान जरूर पहुंचा पर वह कायम है और उसके पास 60% तक एनरिच किया हुआ 440 किलो यूरेनियम मौजूद है।
होर्मुज का सच – इस संघर्ष में होर्मुज एक बड़ा मुद्दा रहा, पर हकीकत यह है कि वह रास्ता तो कभी पूरी तरह बंद नहीं रहा। ईरान ने केवल अमेरिका-इजरायल और उनके सहयोगियों के जहाजों की आवाजाही पर पाबंदी लगाई थी। अब इस के खुलने को बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है, जो महंगे सैन्य अभियान के बाद मिली है।
वार्ता में होगी ये चुनौती – जंग शुरू होने के पहले ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता चल रही थी। जिनेवा में हुई बातचीत में दोनों पक्षों ने एक व्यवहारिक ढांचा तैयार कर लिया था। इसके मुताबिक, ईरान ने संवर्धित यूरेनियम का भंडार नहीं बढ़ाने, मौजूदा स्टॉक को फ्यूल ग्रेड लेवल तक लाने और IAEA के वेरिफिकेशन की बात मान ली थी। लेकिन, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बमबारी शुरू की, तो यह समझौता भी खत्म हो गया। अब जब इस्लामाबाद में फिर से बातचीत शुरू होगी, तो उस पुरानी सहमति तक पहुंचना बहुत बड़ी चुनौती होगी।
अधूरा नैरेटिव – लगातार धमकियों और आखिरी वक्त पर पीछे हटने से इस सीजफायर के लिए रास्ता बना। ट्रंप डेडलाइन बदलते रहे और इससे चेतावनियों का असर धीरे-धीरे कम हो गया। अमेरिका दावा करता रहा कि ईरान की ताकत कम हो गई है, जबकि वह जिद के साथ अड़ा रहा। आखिर में यह साफ हो गया कि ईरान की क्षमता और प्रतिरोध की ताकत, दोनों कायम हैं। अमेरिका के पूर्ण प्रभुत्व का नैरेटिव अधूरा है।
पाकिस्तान का फायदा – सीजफायर की कहानी में पाकिस्तान को एक ईमानदार मध्यस्थ के रूप में दिखाया गया, लेकिन ऐसे संकेत मिलते हैं कि शहबाज शरीफ की अपील को वाइट हाउस में तैयार किया गया था। इसका मतलब है कि पाकिस्तान ने उतनी मध्यस्थता नहीं की, जितना अमेरिका को बच निकलने का रास्ता दिया। छह हफ्ते लंबे संघर्ष में अगर कोई स्पष्ट विजेता है, तो पाकिस्तान।
इजरायल फैक्टर – इजरायल ने सार्वजनिक रूप से सीजफायर का समर्थन किया है, लेकिन उसकी रणनीतिक प्राथमिकता अब अमेरिका से अलग हो सकती है। कई जानकारों का मानना है कि अमेरिका ने इजरायली हितों के लिए हमले शुरू किए थे। अब आगे इजरायल समझौते को मानता है या नहीं- इससे ही भविष्य तय होगा।
चीन की भूमिका – अमेरिका को मिली चोट युद्ध की लागत से कहीं ज्यादा है। यूरोपीय देशों का मदद के लिए आगे न आना NATO पर असर डालेगा, इंडो-पैसिफिक रीजन में वॉशिंगटन कमजोर पड़ सकता है। चीन पर बात करना भी बनता है, जिसकी भूमिका काफी हद तक पर्दे के पीछे रही। शांति पहल पर चर्चा के लिए पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार चीन गए थे। असीम मुनीर भी वहां जा सकते हैं। चीन ने पीछे रहकर इस्लामाबाद का समर्थन किया।
आगे क्या होगा? – अब बातचीत बदले हुए माहौल में होगी। अमेरिका अब भी सैन्य रूप से मजबूत है, पर जाहिर हो चुका है कि ताकत के बल पर वह राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता। बिना शर्त जीत की भाषा बोलने वाले ट्रंप को अब वास्तविक समझौते के तर्क को समझना पड़ सकता है।