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‘जीते जी इलाहाबाद’ से ‘बेघर’ तक, शब्दों से स्त्री जीवन का सच बताती हैं ममता कालिया


ममता कालिया हिंदी साहित्य की प्रमुख लेखिका हैं, जिन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता और संस्मरण में स्त्री जीवन, मध्यवर्गीय समाज और रिश्तों की जटिलताओं को उकेरा। प्रयागराज के साहित्यिक माहौल ने उनकी लेखनी को दिशा दी। उनकी रचनाएं स्त्री संघर्ष, सामाजिक यथार्थ और सच कहने की बेबाकी के लिए आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली मानी जाती हैं।
ममता कालिया एकांतिक आत्म-मंथन और सामूहिक दायित्व बोध को अपने कलात्मक विवेक से चिह्नित और निरंतरता से रेखांकित करने वाली रचनाकार हैं। बहुमुखी लेखिका, जिन्होंने पिछले पांच दशकों से अधिक समय तक अपनी लेखनी से हिंदी कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, संस्मरण और निबंध जैसी विधाओं को समृद्ध किया। उनके लेखन में जिन शहरों का जिक्र आता है, उनमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज) सबसे प्रमुख है। इस शहर का अनुभव और इससे जुड़ी उनकी निहायत व्यक्तिगत जिंदगी को ‘जीते जी इलाहाबाद’ में देखा जा सकता है।
आरंभ में उन्होंने अंग्रेजी में कविताएं लिखीं, लेकिन प्रयागराज आकर रवीन्द्र कालिया और अन्य हिंदी साहित्यकारों – महादेवी वर्मा, अमृत राय, अमरकांत, इलाचंद्र जोशी आदि के संपर्क में आने के बाद वह पूरी तरह हिंदी साहित्य में समाहित हो गईं। उन्होंने लिखा है, ‘एक मोड़ तब आया, जब मैं अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मुंबई से इलाहाबाद आई। यहां के हिंदी प्रेमी वातावरण ने मुझे सोख लिया।’
रचनाओं में महिला मन – ममता कालिया की रचनाएं मुख्य रूप से मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों, विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष, संबंधों की जटिलताओं, प्रेम, वैवाहिक जीवन, कामकाजी महिलाओं की चुनौतियों और सामाजिक यथार्थ पर केंद्रित हैं। वह स्त्रीवादी दृष्टिकोण से लिखती हैं, लेकिन बिना अतिवाद के। स्त्री के संघर्ष को पुरुष के संघर्ष से अलग या कमतर नहीं मानतीं, बल्कि समाजशास्त्रीय रूप से अधिक विकट बताती हैं। उन्होंने 200 से अधिक कहानियां लिखीं – 11 उपन्यास, कई कविता-संग्रह, नाटक और संस्मरण दिए।
वह अपने पहले ही उपन्यास ‘बेघर’ में घर-परिवार की असुरक्षा और स्त्री की पहचान की खोज करती नजर आती हैं। ‘नरक दर नरक’ में वैवाहिक संबंधों की जटिलताओं और मानसिक यातनाओं का चित्रण करती हैं। लड़कियां, एक पत्नी के नोट्स, दुक्खम् सुक्खम्, दौड़ – और उनकी अन्य तमाम रचनाओं में एक गृहिणी के अंतर्मन के गहन आत्मचिंतन को पढ़ा जा सकता है। वह आधुनिक जीवन की भागदौड़ के साथ अंधेरे संबंधों और उसकी मनोवैज्ञानिक गहराई को भी रेखांकित करती रही हैं। अपने लेखन में ममता कालिया मध्यवर्गीय प्रेम को काल्पनिक रोमांस से अलग बताती हैं। वह लिखती है, ‘मध्यवर्गीय जीवन के अपने ताने-बाने हैं। वहां प्रेम के रंग काल्पनिक रंगों से बेहद भिन्न हैं।’
उनकी कहानियां रोजमर्रा के जीवन से निकलती हैं – कामकाजी स्त्री की दोहरी जिम्मेदारी, वैवाहिक संबंधों में असंतुलन, समाज का पाखंड। इसी तरह, उनकी कविताएं घरेलू जीवन की कड़वी सच्चाई और स्त्री के मासूम विद्रोह को व्यक्त करती हैं। उनका प्रसिद्ध संग्रह ‘खांटी घरेलू औरत’ है। इसमें वह लिखती हैं, ‘खांटी घरेलू औरत, शादी के अगले रोज ही वह शामिल हो गई जमात में, खांटी औरत घरेलू बन कर फंस गई बिसात में। उसी घर और बिस्तर पर पुरुष ने भी बिताया समय, फिर भी किसी ने उसे नहीं कहा खांटी घरेलू मर्द।’ मेरे प्रिय हैं उनके संस्मरण – कितने शहरों में कितनी बार, जीते जी इलाहाबाद, रवि कथा, और उनके यात्रा वर्णन।
सच कहने की हिम्मत – ममता कालिया हिंदी साहित्य की वह आवाज हैं, जो घर की चारदीवारी से निकलकर समाज की सच्चाई दिखाती हैं। उनकी लेखनी आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि वह जीवन के दुख-सुख, प्रेम-संघर्ष को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत करती हैं। उनके ‘मौन न रहने को’ मैं निराला की उन पंक्तियों की तरह देखती और समझती हूं, ‘…गर्जन से भर दो वन, तरु-तरु पादप-पादप-तन।’ उनकी रचनाओं की भंगिमाओं को पढ़ते हुए प्रकाश-रेखाओं को छूकर महसूस करने जैसा एहसास लिया जा सकता है।
मुझे याद है, उनको पढ़ते हुए ही मैं कई ऐसे कवियों की उन पंक्तियों तक पहुंची, जिसका रास्ता हिंदी साहित्य में ममता कालिया के साथ ही तय किया जा सकता है। यह दौर तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक मिलाप का सबसे सक्रिय समय है। ममता कालिया की रचनाओं की उपस्थिति और उनकी सक्रियता इस मिलाप को स्पष्टता प्रदान करती है।