
प्रशांत महासागर में अलनीनो की एक प्राकृतिक घटना जन्म ले चुकी है और यह महासागर का तापमान बढ़ा रही है। यह भयानक खतरा पूरे यूरोप को हीटवेब यानी लू से जलाने के बाद अब भारत की ओर बढ़ रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय उपमहाद्वीप में पड़ता है, जहां ज्यादातर खेती-किसानी मानसून पर निर्भर है। भले ही आज खेती करने और सिंचाई के लिए ट्यूबवेल या पंपिंग सेट आ गए हों, मगर बारिश का पानी फसलों के लिए वरदान माना जाता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) भी 2026 में अलनीनो की वजह से मानसून के कमजोर रहने की आशंका जता चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार ने खरीफ की खेती को अलनीनो के कहर से बचाने के लिए तैयारी कर ली है।
अलनीनो: जिलेवार इमरजेंसी प्लान – भारत में अलनीनो संकट से निपटने के लिए सारी तैयारी मैराथन स्तर पर शुरू कर दी गई हैं। सबसे बड़े बुवाई के मौसम से पहले कृषि मंत्रालय ने बीज भंडार, जल प्रबंधन और जिला स्तरीय फसल नियोजन पर केंद्रित एक आपातकालीन योजना शुरू की है, क्योंकि देश में मानसून की कमी की आशंका है।
मंत्रालय ने राज्यों को जिलावार फसल रणनीतियां तैयार करने और खरीफ मौसम में दालों, कुछ बाजरा और सब्जियों जैसी कम अवधि वाली फसलों को बढ़ावा देने का निर्देश दिया है, क्योंकि इनमें कम पानी की आवश्यकता होती है, ये जल्दी पक जाती हैं और मौसम की अनिश्चितताओं से निपटने में सहायक होती हैं।
क्लाइमेट इमरजेंसी इंस्टीट्यूट के निदेशक और Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) के एक्सपर्ट रिव्यूअर पीटर डी कार्टर ने चेतवानी दी है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी की चपेट में यूरोप का पूरा इलाका आ चुका है। भीषण गर्मी की लहर की चपेट में यूरोप है। ऐसे नाजुक समय में किसान चिंतित हैं, तापमान फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले स्तर तक पहुंच रहा है।
अलनीनो: मानसूनी बारिश से सूखे जैसे हालात – भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मानसून की बारिश का अनुमान दीर्घकालिक औसत के लगभग 92 फीसदी लगाया है और चेतावनी दी है कि अलनीनो के प्रभाव के कारण सूखे जैसे हालात पैदा होने की 35 फीसदी आशंका है। अलनीनो एक ऐसा जलवायु पैटर्न है जो कमजोर मानसून और कम कृषि उत्पादन से जुड़ा है। मामले से अवगत एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कुछ जिलों में, जहां अलनीनो का प्रभाव अधिक होने की आशंका है। सरकार सूखा प्रतिरोधी किस्मों के बीज बांट रही है।
अधिकारी ने बताया कि खरीफ की नियमित तैयारियों के विपरीत इस साल मौसम की निगरानी और वितरित किए जा रहे बीजों के प्रकार पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मंत्रालय क्षेत्र-विशिष्ट और फसल-विशिष्ट रणनीतियों के माध्यम से किसानों को समय पर सलाह, संसाधन और विकल्प प्रदान करने के लिए मिशन मोड में काम कर रहा है।
इस वर्ष अलनीनो की स्थिति बनी रहने की संभावना है, इसलिए नीति निर्माताओं को कृषि नुकसान को कम करने और किसानों की आजीविका की रक्षा करने के लिए सूखा-सहिष्णु फसल किस्मों को बढ़ावा देने, मौसम-आधारित कृषि-सलाह सेवाओं, कुशल जल प्रबंधन और स्थान-विशिष्ट अनुकूलन रणनीतियों के माध्यम से इमरजेंसी प्लान को मजबूत करना चाहिए। सुभाष एन पिल्लई, वैज्ञानिक, ICAR
क्या होती हैं खरीफ की फसलें, जिन पर मंडरा रहा संकट – खरीफ की फसलें आमतौर पर मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) में बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काट ली जाती हैं। इन्हें अच्छी बारिश और गर्म तापमान की जरूरत होती है।मगर, इतनी भी ज्यादा गर्मी नहीं कि फसलें ही जल जाएं।
अनाजों में धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी तो दलहन में मूंग, उड़द, अरहर (तुअर), मोठ, लोबिया वगैरह और तिलहन में सोयाबीन, मूंगफली, तिल, सूरजमुखी, अरंडी जैसी फसलें आती हैं। वहीं, नकदी और रेशे वाली फसलें कपास, गन्ना, जूट, सनई भी खरीफ की फसलें मानी जाती हैं।
किसानों को मौसम संबंधी सलाहें दी जा रही है – खरीफ का मौसम जून और जुलाई में पूरे देश में धान, दालें, तिलहन, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई के साथ शुरू होता है और सितंबर और अक्टूबर में कटाई के साथ समाप्त होता है।
ये तैयारियां ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट के आसपास तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान से प्रेरित उर्वरक की बढ़ती कीमतों को लेकर बढ़ती चिंताओं के साथ मेल खाती हैं।
सरकार ने इस चुनौतीपूर्ण वर्ष में किसानों को मौसम की अनियमितता से फसल खराब होने से बचाने और लक्षित, स्थानीय उपायों के माध्यम से आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए जागरूक करने हेतु क्षेत्र-विशिष्ट बुवाई और मौसम संबंधी सलाहें भी जारी की हैं।
अलनीनो के प्रभाव को कम करने के लिए ये हैं तैयारियां – मंत्रालय ने अलनीनो के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए राज्य कृषि विभागों को सिंचाई और जलाशय के जल स्तर की बारीकी से निगरानी करने का निर्देश भी दिया है।
केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले महीने कृषि क्षेत्र की स्थिति और आगामी खरीफ मौसम की तैयारियों का मूल्यांकन करने के लिए आयोजित एक बैठक में अधिकारियों को संभावित प्रतिकूल मौसम स्थितियों से निपटने के लिए कार्य योजना विकसित करने का निर्देश दिया था।
मंत्री ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि किसानों को व्यावहारिक और त्वरित समाधान मिल सकें, इसके लिए बीज, उर्वरक और अन्य आवश्यक कृषि सामग्री, वैकल्पिक फसल विकल्प, बुवाई में देरी की रणनीतियाँ और सूखा-सहनशील किस्मों को बढ़ावा दिया जाए।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से संबद्ध एक संस्थान के कृषि वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, अल नीनो के वर्षों के दौरान कई जिलों में प्रमुख खरीफ फसलों का उत्पादन 10 फीसदी से अधिक गिर जाता है, जिससे सरकार द्वारा सुधारात्मक उपाय करना आवश्यक हो जाता है।
Home / Uncategorized / यूरोप को जलाने के बाद भारत की ओर मुड़ा भीषण खतरा, धान-मक्का को बचा पाएंगे किसान?
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