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हत्यारे को सुधारना संभव, पर साइबर अपराधी को नहीं, CJI सूर्यकांत ने क्यों कही ये बात?


साइबर अपराध के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, साइबर अपराधियों के प्रति किसी तरह की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गुरुवार को टिप्पणी की कि एक हत्यारे को भी सुधरने का मौका दिया जा सकता है, लेकिन साइबर अपराधियों को बिल्कुल नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ उत्तर प्रदेश के सूरज श्रीवास्तव की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के जमानत खारिज करने के आदेश को चुनौती दी गई है।
6.55 लाख रुपये की ठगी – आरोप है कि सूरज ने पार्ट टाइम नौकरी दिलाने के नाम पर शिकायतकर्ता से 6.55 लाख रुपये की ठगी की। जांच में सामने आया कि आरोपी ने पांच बैंक खाते खुलवाए थे, जिनमें ठगी की रकम ट्रांसफर की गई।
साइबर अपराधियों के लिए नरमी नही बरतनी चाहिए। इन्हें अकेली कोठरी में रखना चाहिए, मोबाइल तक का इस्तेमाल न कर सकें। CJI सूर्यकांत
दखल से कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा – सुप्रीम कोर्ट की चिंता इसलिए अहम है क्योकि डिजिटल अरेस्ट अब संगठित साइबर ठगी का रूप बन चुका है। फर्जी अफसर बनकर लोगों को डराकर पैसे ऐंठे जाते हैं। अदालत ने इसे ‘लूट या डकैती’ मानकर इसकी गंभीरता स्पष्ट की है। उसके दखल से केंद्र, RBI, बैक, DOT और जांच एजेंसियों पर समन्वित कार्रवाई का दबाव बढ़ेगा।
वकील की तरह पेश हुए थे जज, केस से अलग – सुप्रीम कोर्ट में एक अहम मामले के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, लेकिन एक तथ्य सामने आने के बाद पूरी प्रक्रिया बदल गई। जस्टिस केवी विश्वनाथन ने खुद को उस केस की सुनवाई से अलग कर लिया, जिसमें वह पहले वकील के तौर पर पेश हो चुके थे। यह मामला एक निजी कंपनी से जुड़ा है। 1 अप्रैल को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने सुनवाई की थी। इससे पहले 17 मार्च को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।
बाद में जस्टिस विश्वनाथन के संज्ञान में आया कि वह इसी मामले में अपीलकर्ता की ओर से कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) के दौरान कॉरपोरेट डेब्टर के खिलाफ वकील के रूप में पेश हुए थे।