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नए कानून से बेहतर होगी सुरक्षा, CAPF विधेयक को हार या जीत के रूप में पेश करना गलत, समझें यह क्यों है जरूरी


भारत आज अंदरूनी और सीमा सुरक्षा की बढ़ती मुश्किलों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में देश ऐसी बहस का जोखिम नहीं उठा सकता, जिसमें नौकरी से जुड़ी छोटी-छोटी समस्याओं को बड़ा अन्याय बताया जाए और सुधार की कोशिशों को संस्था को कमजोर करने के रूप में दिखाया जाए। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 को लेकर जो चर्चाएं चल रही हैं, उसे कुछ लोग ऐसे पेश कर रहे हैं जैसे देश को CAPF अधिकारियों और IPS नेतृत्व में से किसी एक को चुनना पड़ेगा। असल में ऐसा कोई चुनाव है ही नहीं। यह गलत और खतरनाक सोच है।
एकता के लिए: 34 बरसों के अपने करियर में मैंने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) में सेवा दी है। इस दौरान मैंने कई नक्सल प्रभावित इलाकों और सीमा पर काम किया। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि यह विधेयक अधिकारियों की जायज चिंताओं को हल करता है। यह केवल पदोन्नति का सवाल नहीं, देश की विविधता और केंद्रीय ढांचे में सुरक्षा बरकरार रखने का कदम है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश में केंद्रीय समन्वय और एकता के वास्ते अखिल भारतीय सेवाओं को स्टील फ्रेम माना था। IPS हमेशा केंद्र-राज्य, इंटेलिजेंस-ऑपरेशन और राज्य पुलिस-CAPF के बीच सेतु का काम करता रहा है।
कानून क्यों जरूरी
विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत होगा
बेहतर होगा प्रशासन, अफसरों की चिंताओं का हल
करियर को ध्यान में रखते हुए नए पद बनाए गए है
बेहतर तालमेल: इस बहस को कैडर तक सीमित करने वाले लोग एक जरूरी बात भूल जाते हैं कि भारत की आंतरिक सुरक्षा अलग-अलग बलों के टुकड़ों से नहीं चल सकती। एक जिले का खतरा पूरे देश को प्रभावित कर सकता है। खुफिया सूचना पर तुरंत कार्रवाई की दरकार होती है। भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका करियर उन्हें राज्य की पुलिस, CAPF, CRPF, BSF, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसे संगठनों के बीच काम का अनुभव देता है। इससे उन्हें व्यापक परिचालन दृष्टि और बेहतर तालमेल की क्षमता मिलती है, जो देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है।
समन्वय से सफलता: CRPF और BSF में काम के दौरान मैंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमाओं की कठिनाइयां देखी हैं। नक्सल-विरोधी और उग्रवाद-विरोधी अभियानों की समीक्षा बताती है कि सफलता वहीं मिली जहां अधिकारियों ने राज्य की पुलिस, खुफिया एजेंसियों और केंद्रीय बलों में काम किया था। उनका अनुभव उन्हें एक तंत्र की तरह निर्णय लेने और काम करने में सक्षम बनाता है।
खींचतान होगी कम: मेरे ख्याल से न तो सभी IPS अधिकारी हर भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं और न ही सभी CAPF अधिकारी। हर सेवा में सक्षम अधिकारी के साथ कुछ अपवाद भी होते हैं। परिपक्व रास्ता यह है कि दोनों की शक्तियों का उपयोग करने वाली संरचना बनाई जाए ताकि आपसी खींचतान कम हो। CAPF विधेयक की भी यही कोशिश है। यह नियम तय करता है और पदोन्नति में पारदर्शिता लाता है। इसमें काम के समय के साथ और शिकायतों का निपटारा कैसे होगा यह भी तय किया गया है।
चिंता होगी दूर: CAPF में करियर की प्रगति हमेशा चिंता का विषय रही है। इस विधेयक में इसका समाधान है। इसमें DIG, IG और ADG स्तरों पर नए वरिष्ठ पद बनाए गए हैं और ऑर्गनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस (OGAS) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी लागू किए गए हैं। यह CAPF कर्मियों के लिए पारदर्शिता और सुधार सुनिश्चित करने के साथ IPS को आंतरिक सुरक्षा के शीर्ष स्तर पर बनाए रखता है। CAPF अलग नहीं चलते, वे राज्य की पुलिस के साथ काम करते हैं। दोनों में अनुभवी अधिकारी इस सेतु को बेहतर बनाए रखने में सक्षम होते हैं।
केंद्रीय समन्वय जरूरी: यह विधेयक IPS नेतृत्व को वरिष्ठ भूमिकाओं में बरकरार रखते हुए CAPF अधिकारियों के पदोन्नति अवसर बढ़ाता है। आज भारत के सामने सीमा सुरक्षा, आतंकवाद, नक्सलवाद, संगठित अपराध और साइबर खतरों जैसी कई चुनौतियां हैं। यह बिल पदोन्नति को आसान और प्रशासन को साफ-सुथरा बनाता है। साथ ही, IPS नेतृत्व बरकरार रखता है, ताकि देश की सुरक्षा और केंद्रीय समन्वय मजबूत रहे।