
पीड़ितों को केंद्र में रखकर न्याय सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दुबई में रहने वाले एक कारोबारी की याचिका खारिज कर दी। कारोबारी ने उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में उसके खिलाफ दर्ज 24 आपराधिक मामलों को एक साथ जोड़ने और उन्हें दिल्ली की अदालत में ट्रांसफर करने की मांग की थी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने समीर अग्रवाल की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया और पूछा कि क्या अदालत को उसका भव्य स्वागत करना चाहिए और उसकी कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के पीड़ितों को उसकी सुविधा के लिए मुकदमे में शामिल होने के वास्ते दिल्ली आने के लिए मजबूर करना चाहिए।
‘धोखाधड़ी का हर मामला अलग होता है’ – बड़े धोखाधड़ी मामलों में प्राथमिकियों को समेकित करने के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों पर नाराजगी जताते हुए पीठ ने कहा कि पीड़ितों को न्याय देने के बजाय, कई बार आरोपियों की सुविधा के लिए केस जोड़ने और जल्दी सुनवाई जैसे फैसले लिए जा रहे हैं। पीठ ने कहा कि धोखाधड़ी का हर मामला अलग और विशिष्ट होता है क्योंकि पीड़ित एवं धोखाधड़ी से प्राप्त राशि अलग-अलग होते हैं, तथा आरोपी निश्चित रूप से वही रहता है। इसने कहा कि जांच के लिए प्राथमिकियों को समेकित नहीं किया जा सकता, और ‘धोखाधड़ी के ऐसे शिकार न्यायिक प्रणाली के अदृश्य शिकार भी हैं, जिसने उनके बारे में सोचा ही नहीं।’
चीफ जस्टिस ने कहा, ‘क्या यह उचित है कि आप अपने अपराध के पीड़ितों से कहें कि वे कर्नाटक, बिहार और केरल जैसे विभिन्न स्थानों से दिल्ली आकर आपकी जमानत का विरोध करें?’
उन्होंने कहा, ‘आप उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री में 1,000 करोड़ रुपये जमा करें और हम पीड़ितों को यात्रा तथा अच्छे होटलों में ठहरने के लिए धन देंगे, तब हम इस पर विचार कर सकते हैं।’
चीफ जस्टिस ने कहा, ‘पीड़ित-केंद्रित न्यायिक दृष्टिकोण समय की आवश्यकता है।’
पीठ ने कहा कि यद्यपि वह मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है, फिर भी आरोपी को पहले आत्मसमर्पण करना चाहिए और उसके बाद ऐसी राहत की मांग करनी चाहिए।
उत्तराखंड, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की अदालतों में अग्रवाल के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी के अपराधों से संबंधित 24 आपराधिक मामले लंबित हैं।
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