Wednesday , June 3 2026 5:53 AM
Home / News / इस साल दुनियाभर में तूफानों की रफ्तार बदल सकता है अल नीनो, जानें भारत पर क्या होगा असर

इस साल दुनियाभर में तूफानों की रफ्तार बदल सकता है अल नीनो, जानें भारत पर क्या होगा असर


अटलांटिक तूफान का मौसम जून की शुआत से 30 नवंबर तक चलता है, जिसमें तूफानी गतिविधियां सितंबर के मध्य में चरम पर होती हैं। यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मौसम विशेषज्ञों ने अटलांटिक तूफान के मौसम को सामान्य से शांत रहने का अनुमान लगाया है। इसका कारण अल नीनो है। अल नीनो के चलते सामान्य से कम गतिविधि की 55 प्रतिशत, सामान्य के करीब गतिविधि की 35 प्रतिशत और सामान्य से अधिक गतिविधि की 10 प्रतिशत संभावना है।
अल नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान का समय-समय पर गर्म होना है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक हवा और वर्षा प्रणालियों में होने वाले व्यवधान दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बाढ़, सूखे और लू की तीव्रता को बढ़ा सकते हैं। यह मौसमी घटना अपने सक्रिय चरण के दौरान वैश्विक औसत तापमान को बढ़ा देती है।
अल नीनो कब होता है – अल नीनो की घटनाएं आमतौर पर हर दो से सात साल में होती हैं और आमतौर पर नौ से 12 महीने तक चलती हैं। इसका विपरीत रूप ‘ला नीना’ है, जिसका अर्थ है प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से ठंडा होना है। ये दोनों ही ENSO (एल नीनो-दक्षिणी दोलन) नामक एक बड़े जलवायु पैटर्न का हिस्सा हैं।
अल नीनो के दौरान ट्रेड विंड (हवाएं) कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं, जिससे प्रशांत महासागर का गर्म पानी वापस पूर्व की ओर अमेरिका के तटों की ओर बहने लगता है। यह अटलांटिक तूफ़ानों की गतिविधियों को कम करता है, जबकि प्रशांत महासागर में तूफानों की गतिविधियों को बढ़ा देता है।
अल नीनों, एशिया और उत्तर-पश्चिमी प्रशांत – उत्तर-पश्चिमी प्रशांत का व्यवहार दक्षिण की तरह होता है। अल नीनो के दौरान, कुल मिलाकर टाइफून की संख्या उतनी ही रहती है, लेकिन वे कहां बनते हैं, यह बदल जाता है। एशिया के पास समुद्र के पश्चिमी हिस्से में कम टाइफून बनते हैं। इंटरनेशनल डेटलाइन की तरफ पूरब में ज्यादा टाइफून बनते हैं, जिन क्षेत्रों में बहुत कम या कोई बदलाव नहीं हुआ है। दक्षिण-पश्चिमी और उत्तरी हिंद महासागर में तूफानों की संख्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है।
अल नीनो की शुरुआत प्रशांत महासागर में होती है लेकिन इसके प्रभाव पूरी दुनिया में होते हैं। इससे भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, और अमेजन बेसिन में भीषण गर्मी और जंगल की आग का सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर अमेरिका के कुछ हिस्सों- विशेष रूप से दक्षिणी भाग में भारी वर्षा और बाढ़ आ सकती है। उत्तरी अमेरिका में ज्यादा गर्मी देखने को मिल सकती है।
भारत पर असर? – अल नीनो का भारत पर सीधा असर होगा। भारत की कृषि और जल संसाधन मानसून पर निर्भर करती है। अल नीनो इस पर सीधा असर डालेगा। इससे गर्मी लंबी चल सकती है। साथ ही मॉनसून के मौसम में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। इससे फसलों की पैदावार कम हो जाएगी और और खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ जाएंगे। जलवायु परिवर्तन के चलते भारत में पहले ही तापमान बढ़ रहा है। अल नीनो से ये समस्या और बढ़ जाएगी।