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मिसाइल तकनीक से लेकर गगनयान तक; एयर डिफेंस और अंतरिक्ष के क्षेत्र में कैसे भारत को आत्मनिर्भर बना रहा DRDO


रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ( DRDO ) के कारण भारत की डिफेंस क्षमताओं में बड़ा बदलाव आ रहा है। डीआरडीओ ने लगातार आधुकनिक तकनीकों का विकास किया है। DRDO की वजह से ही भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ रही है। डीआरडीओ के नए आविष्कार न केवल सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल क्षमताओं को बेहतर बना रहे हैं, बल्कि महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता के भारत के विजन को भी मजबूत कर रहे हैं।
बढ़ रही भारत की ताकत – अगली पीढ़ी के मिसाइल प्रोपल्शन सिस्टम
सटीक-निर्देशित हथियार
सैन्य लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म
गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन
रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड – रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) अभी चालू हालत में है और DRDO इसका इस्तेमाल कई तरह के रक्षा परीक्षणों के लिए कर रहा है। RTRS एक हाई-स्पीड टेस्टिंग सिस्टम है, जो खास तौर पर डिजाइन किए गए रेल ट्रैक पर बहुत ज्यादा गति हासिल करने के लिए रॉकेट प्रोपल्शन का इस्तेमाल करता है। यह वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को 1,000 KMPH से ज्यादा की गति पर इम्पैक्ट, वाइब्रेशन और सुरक्षा परीक्षण करने में मदद करता है। इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल मुश्किल परिस्थितियों में मिसाइलों, विमान के पुर्जुों, इजेक्शन सीटों, पैराशूट सिस्टम, बख्तरबंद प्लेटफॉर्म और दूसरे सैन्य उपकरणों का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। RTRS ने भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम से जुड़े क्रू एस्केप सिस्टम और पैराशूट सिस्टम के परीक्षण में भी अहम भूमिका निभाई है।
सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट – सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक के कई सफल परीक्षण हो चुके हैं और इसे भविष्य की मिसाइल प्रणालियों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यह ठोस ईंधन प्रणोदन को रैमजेट तकनीक के साथ जोड़ती है, जिससे मिसाइलें अपनी पूरी उड़ान के दौरान लगातार थ्रस्ट (धक्का) बनाए रख पाती हैं। पारंपरिक रॉकेट मोटरों की तुलना में SFDR-संचालित मिसाइलें अधिक दूरी तय कर सकती हैं और उच्च गति प्राप्त कर सकती हैं, साथ ही लक्ष्य पर हमले के अंतिम चरण के दौरान अधिक ऊर्जा भी बचाए रखती हैं। उम्मीद है कि यह तकनीक भविष्य की लंबी दूरी की हवा-से-हवा और सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों की नींव बनेगी, और उन्नत मिसाइल प्रणोदन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी।
एयर ड्रॉपेबल कंटेनर – एयर ड्रॉपेबल कंटेनर (ADC) को भारतीय सशस्त्र बलों के उपयोग के लिए विकसित किया गया है, और इसका परीक्षण तथा इसमें सुधार का कार्य अभी भी जारी है। यह विशेष सैन्य कंटेनर इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसे परिवहन विमानों से पैराशूट की मदद से उतारा जा सके। यह दूरदराज के पहाड़ी इलाकों, आगे की सैन्य चौकियों और आपदा-प्रभावित क्षेत्रों तक जरूरी सामान की तेजी से डिलीवरी मुमकिन बनाता है। इस कंटेनर में गोला-बारूद, खाने का सामान, मेडिकल उपकरण, संचार प्रणाली और अन्य जरूरी चीजें ले जाई जा सकती हैं। इसका डिजाइन यह पक्का करता है कि उतरते समय इसके अंदर रखे सामान को कम से कम नुकसान पहुंचे, जिससे यह सैन्य लॉजिस्टिक्स और मानवीय कार्यों के लिए एक बहुत काम की चीज बन जाता है।
उन्नत बख्तरबंद प्लेटफॉर्म – डीआरडीओ की उन्नत बख्तरबंद प्लेटफॉर्म टेक्नोलॉजी को स्वदेशी बख्तरबंद वाहनों और भविष्य के युद्ध प्रणालियों में शामिल किया जा रहा है। इन प्लेटफॉर्म को सैनिकों की सुरक्षा, गतिशीलता और युद्धक्षेत्र में प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। इनमें उन्नत बैलिस्टिक सुरक्षा, बारूदी सुरंगों से बचाव और परमाणु, जैविक तथा रासायनिक (NBC) सुरक्षा प्रणालियां शामिल हैं। ये प्लेटफॉर्म अत्याधुनिक सेंसर, निगरानी उपकरण, नाइट-विजन क्षमताएं और रिमोट वेपन स्टेशन भी एकीकृत कर सकते हैं, जिससे ये आधुनिक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध वातावरण के लिए उपयुक्त बन जाते हैं।
आकाश एयर डिफेंस सिस्टम – भारत का आकाश एयर डिफेंस सिस्टम स्वदेशी एयर सिस्टम है। इसे DRDO ने विकसित किया है। यह कम दूरी की मिसाइलों को जमीन से हवा में रोकने में सक्षम है। यह जमीन से 18 हजार मीटर की ऊंचाई पर दुश्मन की मिसाइल या ड्रोन को निशाना बना सकता है।
अल्ट्रा लाइट प्रिसिजन गाइडेड मिसाइल – अल्ट्रा लाइट प्रिसिजन गाइडेड मिसाइल (ULPGM) ने अपना परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और वर्तमान में विकास के चरण में आगे बढ़ रही है। इस हल्के, सटीक-निर्देशित मिसाइल को हेलीकॉप्टरों, ड्रोन और हल्के लड़ाकू प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है। दुश्मन के टैंकों, बंकरों और किलेबंद ठिकानों को अत्यधिक सटीकता के साथ नष्ट करने के लिए डिजाइन की गई यह मिसाइल, भारत की टैंक-रोधी युद्ध क्षमताओं को काफी हद तक बढ़ाती है। इसकी मुख्य विशेषताओं में ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ क्षमता और असाधारण सटीकता शामिल है, जो ऑपरेटर के न्यूनतम हस्तक्षेप के साथ लक्ष्यों को तेजी से निशाना बनाने में सक्षम बनाती है।
बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली – बहुत कम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली (VSHORAD) ने अपने उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं और इसे सशस्त्र बलों में शामिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस प्रणाली को ऐसे कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलिकॉप्टरों और ड्रोनों को बेअसर करने के लिए डिजाइन किया गया है, जो अग्रिम पंक्ति की टुकड़ियों और रणनीतिक संपत्तियों के लिए खतरा पैदा करते हैं। एक उन्नत इन्फ्रारेड सीकर से लैस, VSHORAD त्वरित प्रतिक्रिया समय और लक्ष्य को भेदने की उच्च संभावना प्रदान करता है। ऐसे समय में जब ड्रोन युद्ध एक बड़ी सुरक्षा चुनौती के रूप में उभर रहा है, इस प्रणाली से भारत की वायु रक्षा क्षमताओं को, विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों और अग्रिम परिचालन क्षेत्रों में, काफी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा – ये सभी टेक्नोलॉजी मिलकर भारत के रक्षा इकोसिस्टम को आगे बढ़ाने में DRDO की बढ़ती भूमिका को दर्शाती हैं। मिसाइल प्रोपल्शन और सटीक मारक प्रणालियों से लेकर सैन्य लॉजिस्टिक्स, बख्तरबंद युद्ध, वायु रक्षा और अंतरिक्ष मिशन सहायता तक, DRDO अलग-अलग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्वदेशी क्षमताओं का निर्माण कर रहा है। जैसे-जैसे भारत अपनी सशस्त्र सेनाओं का आधुनिकीकरण कर रहा है और विदेशी टेक्नोलॉजी पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है। इन नवाचारों से देश की भविष्य की सैन्य और रणनीतिक क्षमताओं को आकार देने में एक अहम भूमिका निभाने की उम्मीद है।