
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े मामले को ये कहते हुए रद्द कर दिया कि उन पर कोई ठोस आरोप नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही से व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आजादी को सामाजिक बदनामी और कभी न ठीक होने वाला नुकसान पहुंचता है। इसलिए, जब उपलब्ध सामग्री और सबूतों से अपराध के गंभीर न होने का संदेह पैदा हो तो आरोपी को मुकदमे की मुश्किल प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
जान लीजिए पूरा मामला क्या है – जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने कहा कि अस्पष्ट बयानों के आधार पर मुकदमे की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। बेंच ने ओडिशा के एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला यह देखते हुए रद्द कर दिया कि उन पर कोई ठोस आरोप नहीं था। बेंच ने कहा कि यह कोर्ट इस व्यापक विचार से भी सहमत है कि आपराधिक प्रक्रिया को उत्पीड़न का जरिया नहीं बनने दिया जाना चाहिए।
‘कोर्ट का फर्ज है कि वह..’ – पीठ ने कहा कि कानून को बेगुनाहों के लिए ढाल का काम करना चाहिए, न कि बदला लेने की भावना रखने वालों के हाथों में तलवार का। जहां उपलब्ध सामग्री से किसी अपराध के होने का पता न चले, वहां कोर्ट का फर्ज है कि वह कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही इसे रोक दे। आपराधिक मुकदमा कोई मामूली औपचारिकता या केवल रस्म-अदायगी नहीं है जिसे बिना मेरिट के भी झेलना पड़े।
कानून के तहत ऐसा करना मंजूर नहीं: SC – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की कार्यवाही शुरू करने से पहले स्पष्ट और ठोस सामग्री होनी चाहिए जिससे पता चले कि आरोपी ने अपराध किया हो सकता है। सर्वोच्च अदालत ने पाया कि सरकारी अधिकारी पर लगाया गया आरोप इतना व्यापक था कि उसमें कई लोगों को फंसाया जा सकता था, बिना यह देखे कि किसने क्या काम किया या किसकी क्या गलती थी; कानून के तहत ऐसा करना मंजूर नहीं है। हमारी राय है कि आरोपी के खिलाफ किसी साफ काम या ठोस आरोप के बिना, केवल सामान्य आरोपों के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
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