
से सरकार का नियंत्रण हो जाएगा। सरकार को ऐसे अन्य सभी क्लबों पर भी नजर डालनी चाहिए, जो कुलीन और प्रतिष्ठित समझे जाते हैं। इनमें भाई-भतीजावाद चरम पर होता है और इनके पास संपत्ति ज्यादातर बड़ी व मूल्यवान होती है।
पुराने अवशेष: देश के हर बड़े शहर में ऐसे क्लब हैं। इनमें से अधिकतर बड़े क्लब अंग्रेजी हुकूमत के अवशेष हैं। इन्हें ऐसी जगहों के रूप में बनाया गया, जहां सत्ताधारी अभिजात वर्ग सामाजिक मेलजोल बढ़ा सके। वे सत्ता में थे तो उन्होंने निजी मनोरंजन के लिए बड़ी-बड़ी सार्वजनिक भूमि अपने नाम कर ली। तब पूरा देश उनके लिए निजी मनोरंजन का साधन था, ऐसे में सवाल उठता भी कहां।
पीने-पिलाने की जगह: जब गोरे चले गए, तब इन क्लबों में भारत के नए अभिजात वर्ग को जगह मिली – भूरे साहब। अब भूरे साहब भी जा चुके हैं और वे इन क्लबों के सदस्य बनने की हसरत नहीं पाल सकते। पहले के क्लब सत्ता का विस्तार हुआ करते थे, आज के क्लब ज्यादातर रईसजादों के पीने-पिलाने की जगह। यहां मैदानी खेल नहीं होते, ताश के पत्ते फेंटे जाते हैं।
योग्यता की अनदेखी: आम भाषा में कहा जाए, तो अभिजात वर्ग का अर्थ होता है अधिक सक्षम लोगों का समूह। समाजशास्त्र की भाषा में जाएं, तो एलीट वे हैं, जिनका धन या शक्ति के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण है। सी. राइट मिल्स ने अपनी किताब ‘द पावर एलीट’ में अभिजात वर्ग का वर्णन किया है। उनके मुताबिक, ‘राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य क्षेत्र, जो आपस में जुड़े हुए हैं, छोटे लेकिन प्रभावशाली हैं और जो राष्ट्रीय स्तर पर फैसले लेते हैं।’ लेकिन देश के अधिकांश एलीट क्लब इस वर्णन से मेल नहीं खाते।
वंशानुगत उत्तराधिकार: ये अब केवल सोशल क्लब हैं, जिनकी मेंबरशिप जन्म पर निर्भर करती है। सरकार ने अपनी याचिका में परिवारवाद शब्द का इस्तेमाल किया है। यह शब्द एक खास भारतीय सिस्टम के बारे में बताता है, जो वंशानुगत उत्तराधिकार और भाई-भतीजावाद का मेल है। पूरे भारत के क्लबों में वंश के आधार पर सदस्यता का चलन बढ़ता जा रहा है। अधिकतर ने नियम बना दिया है, जहां क्लब मेंबर्स के बच्चों को आश्रित होने के कारण अपने आप सदस्यता मिल जाती है। यह सदस्यता भी एक निश्चित आयु वर्ग तक के बच्चों को ही मिलती है।
संवैधानिक वैधता: अब चूंकि क्लबों में आश्रितों को प्राथमिकता मिल रही है, किसी बाहरी के लिए सदस्यता हासिल करना लगभग असंभव हो गया है। कई लोग सीधे रास्ते से सदस्य बने भी, तो इतनी देर से कि अब उनके बच्चे आश्रित के तौर पर क्लब में एंट्री नहीं पा सकते। संवैधानिक रूप से वंशानुगत सदस्यता पर सवाल खड़े होते हैं। लेकिन, कौन सदस्य इसे चुनौती देने जाएगा?
साझा संसाधन: देश के ज्यादातर क्लब प्राइवेट हैं, पर वे सार्वजनिक भूमि पर बने हैं, जिसे साझा संसाधन माना जा सकता है। साझा संसाधन मतलब वे चीजें, जो समाज के हर व्यक्ति को उपलब्ध होनी चाहिए।
Home / News / सार्वजनिक जमीन पर एलीट और भाई-भतीजावाद का कब्जा’; जिमखाना मामले पर एक्सपर्ट ने किया सरकार का समर्थन
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