Thursday , May 28 2026 6:13 AM
Home / News / AI से मिलेगी अदालतों को रफ्तार? लंबित मुकदमों पर लें तकनीक की मदद

AI से मिलेगी अदालतों को रफ्तार? लंबित मुकदमों पर लें तकनीक की मदद


सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में एक नाबालिग लड़की से रेप के मामले में सजा सुनाई। दोषी तब 53 साल का था, लेकिन उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने पेश किया गया। वजह? जब उसने जुर्म किया, तब वह 16 साल और दो महीने का था। 1988 में उसने जो अपराध किया था, विभिन्न अदालतों से गुजरते हुए उसकी सुनवाई में लगभग 37 साल बीत गए। भारतीय न्याय व्यवस्था का यह सबसे ज्यादा परेशान करने वाला पक्ष है।
करोड़ों केस लंबित: न्याय का सबसे आम सिद्धांत है कि वह समय से मिले और होता भी दिखे। न्याय मिलने में होने वाली देरी न्याय से इनकार करने के समान है। लेकिन, यहां न्यायपालिका चाहते हुए भी कई बार तेजी नहीं ला पाती क्योंकि उस पर करोड़ों मुकदमों का बोझ है। देश की अदालतों में साढ़े पांच करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं। केवल निचली अदालतों में ही पौने पांच करोड़ के करीब मामले फंसे हुए हैं। सभी हाईकोर्ट में कुल 60 लाख से ज्यादा और सुप्रीम कोर्ट में 94 हजार से अधिक।
देरी की वजह: शीर्ष अदालत में मौजूदा साल में ही अभी तक 33,298 मामले आ चुके हैं और निपटाए गए हैं 31,126। सरल हिसाब यह है कि पुराने मुकदमों की फाइल बढ़ती जा रही है और यह स्थिति ऊपर से नीचे तक – सभी अदालतों में है। इस देरी की शुरुआत बिल्कुल शुरू से होती है – जांच में लापरवाही, चार्जशीट फाइल करने में देरी, गवाहों का मुकरना, सबूतों की कमी और सबसे बढ़कर जजों के खाली पद।
लंबा इंतजार: लोअर कोर्ट में, जहां मुकदमों की कतार सबसे ज्यादा है, जजों के 19% पद खाली हैं। हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के 32% पद भरे जाने का इंतजार कर रहे हैं। इन सबका असर पड़ रहा है न्याय मिलने की रफ्तार पर। छोटे-छोटे मामलों में भी तमाम आरोपी लंबे अरसे से जेल में हैं, क्योंकि जमानत पर सुनवाई नहीं पूरी हो पा रही। यह संविधान की ओर से दिए गए गरिमापूर्ण जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
आर्थिक मामले: इस देरी का आर्थिक पहलू भी नहीं भूलना चाहिए। देश की अदालतों में कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़े मामले भी बड़ी संख्या में लंबित हैं। 2018 की एक रिपोर्ट बताती है कि कमर्शल विवादों के लंबित मामलों की संख्या 2015 के 17,539 से बढ़कर 2017 में 39,141 हो गई थी। यानी सिर्फ दो साल में 123% की बढ़ोतरी।
कॉरपोरेट विवाद: Insolvency and Bankruptcy Code के तहत दिसंबर 2025 तक 8,800 से ज्यादा कॉरपोरेट दिवालिया मामले दाखिल हो चुके थे। सिर्फ बड़ी NCLT बेंचों में ही 1.82 लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। विभिन्न रिसर्च संस्थानों के अनुसार, ट्रिब्यूनलों में लगभग 3.56 लाख बिजनेस डिस्प्यूट लंबित हैं। इनमें टैक्स, कॉरपोरेट, दिवालियापन और बैंकिंग विवाद शामिल हैं।
विकास पर असर: न्याय में देरी से आर्थिक मामले और गंभीर हो जाते हैं क्योंकि उनका असर कई लोगों पर पड़ता है। महत्वपूर्ण प्रॉजेक्ट्स में समय सबसे बड़ी लागत है और वह खर्च होता है कोर्ट के चक्कर लगाने में। इस दौरान पैसा फंसा रहता है, कई बार वर्कफोर्स का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पाता और पूरे सिस्टम को लेकर जो नकारात्मक छवि बनती है, वह अलग।
तकनीक की मदद: पेंडिंग केस समय पर निपटाने के लिए अब जरूरत है तकनीक को और ज्यादा अपनाने की। आर्थिक मामलों में खासतौर पर AI और टेक्नॉलजी से बहुत मदद मिल सकती है। अभी दस्तावेजों की जांच और छानबीन में काफी वक्त लगता है। सुनवाई की शेड्यूलिंग तय करने, दस्तावेज सहेजने और एनालिसिस में अगर मशीनों की मदद ली जाए, तो इसमें हर्ज नहीं है।
स्मार्ट सहायक: AI ने आज मेडिकल फील्ड को ज्यादा सशक्त बना दिया है। अगर टेक्नॉलजी जान बचाने में सहयोग कर सकती है, तो फैसले लेने में क्यों नहीं? AI ऐसा सहायक बन सकता है, जो हर जरूरत ज्यादा तेजी से पूरी करेगा। हालांकि अंतिम निर्णय हमेशा इंसान का ही होगा। मशीन कितनी भी स्मार्ट हो जाए, वह एक इंसानी विवेक और समझ की बराबरी नहीं कर सकती।