
ईरान ने अमेरिका के साथ समझौते में मजबूती से अपनी बात रखी है और कई मुद्दों पर कड़ा रुख दिखाया है। लेबनान में हमलों के जवाब में इजरायल पर मिसाइल दागने जैसा सख्त फैसला भी तेहरान ने लिया है। यह फैसले ईरान के मौजूदा नेतृत्व के रुख को जाहिर करता है। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के समय के हिसाब से ईरान अब ज्यादा सख्त नजर आ रहा है। इस रुख के पीछे जो नेता हैं, उनमें एक अहम नाम अहमद वाहिदी का है।
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका से युद्ध शुरू होने के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के कमांडर बने अहमद वाहिदी तेहरान में सबसे ताकतवर लोगों में से एक बनकर उभरे है। वह इजरायल और अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख अपना रहे हैं।
वाहिदी ने चलवाईं इजरायल पर मिसाइलें – रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल ही में इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने के पीछे वाहिदी सबसे अहम थे। वाहिदी ने ईरानी नेतृत्व पर जोर दिया कि लेबनान में हिजबुल्लाह पर हो रहे इजरायली हमलों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। उन्होंने इजरायल पर मिसाइल हमले करने पर जोर दिया।
वाहिदी ने ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को इजरायल पर मिसाइल लॉन्च का समर्थन करने के लिए मनाया। इससे 8 अप्रैल के संघर्ष-विराम के बाद ईरान और इजरायल के बीच पहली बार गोलीबारी हुई। ईरान का यह कदम इजरायल को सख्त संदेश देने के साथ ही तेहरान में वाहिदी की पकड़ दिखाता है।
अमेरिका के सामने ना झुकने पर जोर – जर्नल की रिपोर्ट में वाहिदी को ईरानी सत्ता का प्रमुख व्यक्ति और वॉशिंगटन से बातचीत में तेहरान के अडिग रुख के पीछे मुख्य ताकत बताया गया है। 67 वर्षीय वाहिदी को शासन की सबसे प्रभावशाली आवाज माना जाता है। उन्होंने ईरान से तब तक समझौता ना करने के लिए कहा है, जब तक उनकी मांगें पूरी ना हो जाएं।
वाहिदी ने अमेरिका के सामने स्थिति मजबूत करने के लिए ईरान की सैन्य ताकत (डिटेरेंस) बढ़ाने पर जोर दिया है। अहमद वाहिदी का ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और विदेश मंत्री अब्बास अराघची से कई मुद्दों पर टकराव होता रहा है। हालांकि ज्यादातर मुद्दों पर आखिरकार वाहिदी की ही बात मानी गई है।
इस भूमिका में अहमद वाहिदी जैसे व्यक्ति की ऐसी नियुक्ति लगभग अभूतपूर्व थी। वहीदी का आगे बढ़ना आंशिक रूप से अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव में अधिक अनुभवी और कम विवादित कमांडरों के मारे जाने का नतीजा था। सईद गोलकर
मुश्किल स्थिति में बने IRGC कमांडर – अहमद वाहिदी को रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का कमांडर तब बनाया गया, जब मोहम्मद पापोर 28 फरवरी के अमेरिका-इजरायल गठबंधन के हवाई हमलों में मारे गए। उनको ऐसे समय आईआरजीसी की कमान मिली, जब सैन्य नेतृत्व और अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान मुश्किल में था। वाहिदी ने तेजी से तंत्र पर पकड़ बना ली।
सुरक्षा तंत्र में लंबे करियर के बावजूद वाहिदी को युद्ध के मैदान के अनुभवी कमांडर के बजाय मुख्य रूप से खुफिया विभाग के बैकग्राउंड वाले व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है। शासन की सबसे शक्तिशाली सशस्त्र सेना (IRGC) पर वाहिदी का नियंत्रण उन्हें युद्ध खत्म करने की बातचीत पर सीधा प्रभाव डालने का मौका देता है।
वाहिदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘वांछित’ माना जाता है। 2007 में अर्जेंटीना ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उन पर ब्यूनस आयर्स में AMIA यहूदी कम्युनिटी सेंटर पर 1994 के बम धमाके की साजिश का आरोप था। इजरायली अधिकारी
वाहिदी का लंबा सैन्य करियर – अहमद वाहिदी 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के संस्थापक कोर का हिस्सा थे। 1982 में 23 साल की उम्र में इसके खुफिया विभाग के हेड बने। बाद में उन्होंने कुद्स फोर्स बनाई, जो IRGC की यूनिट है और 1988 में इसके पहले कमांडर बने। 1990 के दशक में उन्होंने हिजबुल्लाह को लेबनान की प्रमुख सैन्य ताकत बनाने में मदद की।
वाहिदी ने रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के डिप्टी कमांडर के तौर पर काम किया है। करीब 2,00,000 सदस्यों वाले रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की कमान संभालने के बाद वाहिदी ने सत्ता पर पकड़ मजबूत की है। जर्नल के अनुसार, फिलहाल वाहिदी सीधेतौर पर इस बात को प्रभावित कर रहे हैं कि ईरान किसी समझौते पर बढ़ेगा या फिर लड़ता रहेगा।
Home / Uncategorized / ‘इजरायल पर मिसाइल हमले से डील में सख्ती तक’, ईरान की सत्ता का नया ‘बॉस’, जिसने बढ़ाई ट्रंप-नेतन्याहू की मुश्किल
IndianZ Xpress NZ's first and only Hindi news website