
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में बुधवार को अस्थायी सीट के लिए हुए मतदान में जर्मनी को हार का सामना करना पड़ा है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अगले दो साल के लिए अस्थायी सदस्यता पाने का सपना टूट गया है। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने इस नतीजे को सचमुच निराशाजनक बताया है। जर्मनी को सीट पाने के लिए महासभा में दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी, जिसे हासिल करने में वह नाकाम रहा।
‘पश्चिमी यूरोप और अन्य समूह’ में 2 सीटों के लिए जर्मनी का मुकाबला ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल से था। ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल दोनों अपने लिए सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पक्की करने में सफल रहे, क्योंकि उन्हें जर्मनी की तुलना में ज्यादा वोट मिले। पुर्तगाल को 134 वोट मिले, जबकि ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले। वहीं, जर्मनी 104 वोट ही हासिल कर सका।
भारत के लिए चेतावनी – यह हार नई दिल्ली के लिए भी चेतावनी है, क्योंकि जर्मनी उस G-4 समूह का सदस्य है, जिसके तहत भारत स्थायी सदस्यता के लिए जोर लगा रहा है। G-4 चार देशों का समूह हैं, जिसमें भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान शामिल हैं। यह समूह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में बड़े बदलाव की मांग कर रहा है, जिसमें स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग भी शामिल है।
एक्सपर्ट का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चुने जाने में जर्मनी की नाकामी UNSC का स्थायी सदस्य बनने की कोशिश के लिए एक सबक है। इस हार के बाद भारत को G-4 की रणनीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत होगी, जिसके तहत ये देश स्थायी सदस्यता के लिए जोर दे रहे हैं।
रूस ने चलाया था जर्मनी के खिलाफ अभियान – जर्मनी संयुक्त राष्ट्र में दूसरा सबसे बड़ा योगदान देने वाला देश है, लेकिन अस्थायी सदस्यता के दांव में उसे मात खानी पड़ी। वोटिंग से पहले विदेश मंत्री वेडेफुल ने कहा कि जर्मनी के पास एक अच्छा प्रस्ताव है। वेडेफुल ने UNSC में सुधार की वकालत की थी, ताकि ग्लोबल साउथ देशों की भूमिका को और मजबूत बनाया जा सके। जर्मन मीडिया संस्थान DW ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि रूस ने UNSC में जर्मनी के दावेदारी के खिलाफ जोरदार लॉबिंग अभियान चलाया था। इसकी वजह जर्मनी का यूक्रेन को समर्थन है, जो रूस के लगातार हमले का सामना कर रहा है।
Home / Uncategorized / UNSC में रूस के दांव से हारा जर्मनी, भारत के लिए क्यों चेतावनी? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की राह मुश्किल
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